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Sunday, April 18, 2021

किशोरियों एवं महिलाओं का हो रहा है ऑनलाइन उत्पीडऩ… जाने केसे

—58 फीसदी युवा महिलाएं ऑनलाइन उत्पीडऩ का शिकार, करती हैं सामना
—दुनिया के 22 देशों में किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण में खुलासा
—14,000 किशोरियों और महिलाओं ने इस सर्वेक्षण में हिस्सा लिया
—फेसबुक, इंस्टाग्राम, टवीटर, व्हाटएैप और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये

(अदिति सिंह) 
नयी दिल्ली/ टीम डिजिटल : किशोरियों एवं महिलाओं के लिए सोशल मीडिया एवं आनलाइन सिस्टम के तहत काम करना आज कल करना पड रहा है। लेकिन इसी आनलाइन सिस्टम के जरिये महिलाओं के साथ उत्पीडन भी खूब हो रहा है। इसके तहत उन्हें शारीरिक और यौन हिंसा से भी गुजरना पडता है। यह हम नहीं बल्कि एक वैश्विक सर्वेक्षण में पता चला है। जानकारी के मुताबिक दुनिया के 22 देशों में किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ है कि ऑनलाइन हिंसा और दुव्र्यवहार का शिकार होने वाली बड़ी आबादी में लड़कियों और युवा महिलाओं की संख्या काफी ज्यादा है। यह सर्वेक्षण ब्रिटेन के संगठन प्लान इंटरनेशनल ने किया है और इसका शीर्षक स्टेट ऑफ द वल्र्ड्स गल्र्स रिपोर्ट यानी दुनिया में लड़कियों की स्थिति है।

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भारत, ब्राजील, नाइजीरिया, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, थाईलैंड और अमेरिका समेत 22 देशों की 15-25 वर्ष की 14,000 किशोरियों और महिलाओं ने इस सर्वेक्षण में हिस्सा लिया। इस सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाली 58 फीसदी लड़कियों और महिलाओं ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टवीटर, व्हाटएैप और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन उत्पीडऩ और दुव्र्यवहार का सामना करना पड़ा है। प्रभावित महिलाओं का प्रतिशत दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों के लिए समान था। यह सर्वेक्षण 11 अक्टूबर को दुनिया भर में मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस से पहले जारी हुआ है।

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सर्वेक्षण के अनुसार, ऑनलाइन उत्पीडऩ का सामना करने वाली लड़कियों में से 47 फीसदी को शारीरिक और यौन हिंसा की धमकियां मिलीं जबकि 59 फीसदी को दुव्र्यवहार और अपमानजनक भाषा का सामना करना पड़ा। सर्वेक्षण के मुताबिक, अल्पसंख्यक और एलजीबीटीक्यू समुदायों से ताल्लुक रखनेवाली महिलाओं का कहना है कि उन्हें उनकी पहचान की वजह से निशाना बनाया गया। प्लान इंटरनेशनल की मुख्य कार्यकारी एन-बिरगिट अलब्रेस्टन ने कहा, लड़कियों को उत्पीडऩ के जरिए चुप कराया जा रहा है। लैंगिक समानता और एलजीबीटी समेत अन्य मुद्दों पर बोलने वाले कार्यकर्ताओं को भी प्राय: निशाना बनाया जाता है। ऐसे लोगों और उनके परिवार को धमकियां मिलती हैं।

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