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Sunday, February 28, 2021

दिल्ली में क्या कोरोना का पीक खत्म हो चुका?

– शरीर को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ लोगों के दिमाग पर भी कर रहा असर

नई दिल्ली/कंचन लता। कोरोना काल में आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण आपका स्वास्थ्य, आपकी सेहत और आपकी इम्युनिटी है। जिस अदृश्य दुश्मन से दुनिया लड़ रही है, उसे हराने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि आपका शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत हो। इस संबंध में पालमोनोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. आशीष जायसवाल ने बताया कि दिल्ली में कोरोना का पीक खत्म हो चुका और 15 जुलाई के बाद मामले और भी कम हो जाएंगे। हालांकि एम्स के महानिदेश रणदीप गुलेरिया का मानना है कि दिल्ली में कोरोना का पीक आना बाकी है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है कि पीक कब आने वाला है।

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डॉ. आशीष जायसवाल ने कहा कि दिल्ली में पिछले 10 दिन से बहुत ही पॉजिटिव इंडिकेशन दिख रहे हैं। ये हम अपने हॉस्पिटल में भी देख रहे हैं और जब मैं सरकारी या प्राइवेट अस्पतालों के अपने साथियों से बात करता हूं तो जो ट्रेंड्स दिख रहे हैं उससे पता लगता है कि हम पीक को पार कर चुके हैं। पीक पार करने का मतलब है कि हम फ्लैटिव फेस के लिए शुरू कर चुके हैं। इस फेस पर 2 से 3 या फिर 4 हफ्ते तक रहेंगे और फिर नंबर्स कम होने शुरू हो जाएंगे।

डॉक्टर आशीष जायसवाल ने आगे कहा कि तीन-चार जो मेन इंडिकेशन है उनमें पहला इंडिकेशन है डेली पॉजिटिव रेट। 2-3 हफ्ते पहले हम 8-10 हजार टेस्ट कर रहे थे तो 2-3 हजार कोरोना के मामले आ रहे थे लेकिन आज जब हम दिन में 20 हजार टेस्ट कर रहे हैं फिर अधिकतम केस 2400-2500 ही हैं। ऐसे में जब टेस्ट की संख्या बढ़ी है तो तुलनात्मक रूप से कोरोना के मामले पहले से कम हुए हैं।

दिमाग पर भी असर डाल रहा कोरोना

वहीं, एक सर्वे में सामने आया है कि कोरोना के मरीजों में स्ट्रोक, साइकोसिस और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं। लैंसेट साइकेट्री में छपी इस स्टडी में 125 कोरोना मरीजों पर सर्वे किया गया। ये सभी वो मरीज हैं जिनमें किसी न किसी तरह की न्यूरोसाईक्रियाट्रिक परेशानी पाई गई थी। स्टडी के मुताबिक इनमें से 57 मरीजों को ब्रेन स्ट्रोक, 39 मरीजों को इंसेफेलाइटिस यानी भ्रम और गतिशीलता में परेशानी, 10 मरीजों को साइकोसिस यानी एक तरह का पागलपन और 6 मरीजों में डिमेंशिया यानी दिमाग पर नियंत्रण न रहने की समस्या देखी गई। इस मामले पर डॉ. आशीष जायसवाल ने कहा कि कोरोना पॉजिटिव मरीजों में 12% मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें मानसिक रूप से किसी न किसी परेशानी का सामना करना पड़ता है और अब इस तरह की रिसर्च बता रही हैं कि कैसे ब्लड क्लॉटिंग भी एक बड़ा कारण बनता जा रहा है।

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