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Monday, August 2, 2021
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संसद में टकराव : कांग्रेस करती है खून से खेती, BJP नहीं

-कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किया कृषि कानूनों का बचाव                                  – बोले-कानूनों में काला क्या है, कोई तो बताए

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल । राजधानी के सीमा पर बीते 72 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन और संसद में हंगामे पर विपक्ष को आड़े हाथ लेते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि खून से खेती कांग्रेस करती है, भाजपा नहीं। तीनों नए कृषि कानूनों का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष इन कानूनों को काला कानून कह रहा है, लेकिन काला क्या है, यह तो बताए, ताकि संशोधन किया जा सके।
राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर जारी चर्चा में हिस्सा लेते हुए तोमर ने कहा कि कृषि कानूनों को लेकर विपक्षी सदस्यों ने सरकार को कोसने में कोई कंजूसी नहीं की और इन कानूनों को काला कानून बताया। लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि किसान यूनियनों से भी दो महीने तक मैं यही पूछता रहा कि कानून में काला क्या है, एक भी मुझे बताओ तो मैं उसको ठीक करने की कोशिश करूंगा, लेकिन मुझे वहां भी मालूम नहीं पड़ा। तोमर ने कहा कि विपक्षी सदस्यों ने भी कानूनों को खराब बताया और इन्हें वापस लेने की मांग की लेकिन किसी ने यह बताने की कोशिश नहीं की कि इन कानूनों के कौन से प्रावधान किसानों के प्रतिकूल हैं।
तोमर जब बोल रहे थे तो कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने कोई टिप्पणी की जो सुनी नहीं जा सकी। इसके जवाब में कृषि मंत्री ने आरोप लगाया कि पानी से खेती होती है, खून से खेती सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है। भाजपा खून से खेती नहीं कर सकती। जाहिर तौर पर उनका इशारा कांग्रेस की ओर से तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जारी पुस्तिका खेती का खून की ओर था। तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार किसानों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हैं और नए कानूनों का मकसद किसानों की आय में वृद्धि करना है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने लगातार कोशिश की है कि किसानों की आमदनी दोगुनी हो और किसानी का योगदान देश की जीडीपी में तीव्र गति से बढ़े। तीनों कृषि कानून इस दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम हैं।
तोमर ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को एक राज्य का मसला बताया और कहा कि वहां भी किसानों को बरगलाया गया है। उन्होंने साफ किया कि नए कानूनों में ऐसे कोई प्रावधान नहीं हैं जिनसे किसानों की जमीन छिन जाने का खतरा हो। कांग्रेस के दीपेन्द्र हुड्डा सहित अन्य विपक्षी सदस्यों ने कृषि मंत्री के इस दावे का विरोध किया और इसे लेकर तोमर के साथ उनकी नोकझोंक भी हुई। उन्होंने कहा कि कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) के भीतर राज्य सरकार का टैक्स है और एपीएमसी के बाहर केंद्र सरकार का टैक्स है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का कानून एक कर को खत्म करता है और राज्य सरकार का कानून कर देने के लिए बाध्य करता है… तो जो कर ले रहा है और लगा रहा है और बढ़ा रहा है, आंदोलन उसके खिलाफ होना चाहिए या जो कर मुक्त कर रहा है उसके खिलाफ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में उलटी गंगा बह रही है।

सरकार ने किसानों से किए वादे नहीं निभाए

इससे पहले चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के आनंद शर्मा ने कहा कि महामारी से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। हमारी जीडीपी टूट रही थी। लॉकडाउन में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं और कई उद्योग हमेशा के लिए खत्म हो गए। इसके लिए सीधे सरकार जिम्मेदार है। शर्मा ने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड के दौरान लाल किले पर हुई घटना पर अफसोस जाहिर करते हुए इसकी निष्पक्षता से जांच कराने की मांग की। मल्लिकार्जुन खडग़े ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने किसानों के साथ किए गए वादे पूरे नहीं किए। उल्टे तीन ऐसे कृषि कानून बना दिए जो किसानों के हित में नहीं हैं। उन्होंने कानूनों को तत्काल वापस लिए जाने की मांग की। शिवसेना नेता संजय राउत ने आरोप लगाया कि किसानों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए उनके लिए खालिस्तानी, आतंकवादी जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। बसपा के सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि सरकार नए कानूनों को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने की बात कर रही है तो उसे अपनी जिद छोड़कर इन कानूनों को वापस ले लेना चाहिए। कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा ने ये कानून कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को लाभ देने के लिए लाए गए हैं।

मुद्दे के समाधान के लिए पीएम मोदी करें पहल

शिरोमणि अकाली दल के सुखेदव सिंह ढींढसा ने कहा कि कृषि कानून और किसान आंदोलन के हल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहल करनी चाहिए। भाकपा नेता विनय विश्वम ने मांग की कि युवाओं के लिए मनरेगा की तर्ज पर भगत सिंह रोजगार योजना शुरू की जानी चाहिए। राकांपा नेता प्रफुल्ल पटेल ने किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि यह सोचने का विषय है कि अन्नदाता क्यों खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वहीं, बीजद सदस्य सस्मित पात्रा ने कहा कि अगर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को सही तरीके से लागू किया जाए तो मौजूदा एमएसपी में खासी वृद्धि करनी होगी। राज्यसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के बाद भी आंदोलन को इतना लंबा नहीं खींचना चाहिए था।

चौथे दिन भी लोकसभा में नहीं हो सका कामकाज

कृषि कानूनों के मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के कारण लगातार चौथे दिन भी लोकसभा में कामकाज बाधित रहा। शुक्रवार को अपराह्न चार बजे सदन की कार्यवाही आरंभ होते ही कृषि कानूनों की वापसी और किसान आंदोलन के मुद्दे पर चर्चा को लेकर कांग्रेस और द्रमुक समेत कई विपक्षी दलों के सदस्य अध्यक्ष के आसन के समीप आकर नारेबाजी करने लगे। शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, सपा और बसपा के सदस्य भी अपने स्थान पर खड़े नजर आए जबकि तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने नारेबाजी में हिस्सा नहीं लिया। स्पीकर ओम बिरला ने सदन व्यवस्थित नहीं हो पाने के चलते एक बार स्थगन के बाद सदन की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

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