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Wednesday, August 17, 2022

उपराष्ट्रपति चुनाव : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धाकड़… ‘धनखड़ स्ट्रोक’

नई दिल्ली,/खुशबू पाण्डेय : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चिर परिचित अंदाज में आज फिर देश, राजनीतिक पंडितों एवं उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के लिए चल रहे दावेदारों को चौका दिया। राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की तर्ज पर उपराष्ट्रपति पद के लिए भी  जगदीप धनखड़ के नाम का चुनाव कर  ‘धाखड़ स्ट्रोक  मार दिया। धनखड़ को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने बड़ा सियासी दांव खेला है। धनखड़ के बहाने भाजपा से खफा जाट समुदाय को पार्टी साधने की कोशिश तो करेगी ही, राजस्थान और हरियाणा में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी खेला होगा। इसके अलावा राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं दिल्ली में बड़ा मैसेज जाएगा।

उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में जगदीप धनखड़ का ऐलान का चौकाया
-धनखड़ के बहाने एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश करेगी भाजपा
-भाजपा से खफा जाट समुदाय, किसानों को साधने की कोशिश
-ममता बनर्जी से टकराव ने धनखड़ को लाया प्रधानमंत्री मोदी के करीब
-धनखड़ के हर कदम से बंगाल में भाजपा होती गई मजबूत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाक का सवाल बने कृषि बिलों के खिलाफ बड़ा आंदोलन जाट समाज और किसानों ने खड़ा किया, सरकार बैकफुट पर आई और बिल वापस हुए। बावजूद इसके किसान सरकार से अभी भी खुश नहीं हैं। लेकिन, भाजपा के इस ‘धाखड़ स्ट्रोकÓ से बड़ा बदलाव संभव है।
जुलाई 2019 में बंगाल के राज्यपाल बने जगदीप धनखड़ ने राज्य में जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को डैमेज किया, भारतीय जनता पार्टी के लिए जमीन तैयारी होती चली गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनका लगातार टकराव होता रहा। दोनों के बीच तल्खी इस कदर बढ़ चुकी थी कि मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया था।

दिसंबर में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर छात्रों ने धनखड़ को रोककर काले झंडे दिखाए थे। इसके बाद से धनखड़ बंगाल की कानून व्यवस्था और वहां की सरकार की भूमिका को लेकर काफी मुखर रहे। वह सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट्स के जरिए यह लिखते रहे कि राज्यपाल के अधिकार क्या कहते हैं और किस तरह मुख्यमंत्री राज्यपाल को जानकारी देने के लिए बाध्य हैं। बंगाल में राज्यपाल के हर कदम से भाजपा दिनो दिन मजबूत होती चली गई। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव भाजपा को रास आने लगा। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को 77 सीटें हासिल हुई। जबकि 213 सीटें टीएमसी को मिली थी। 2022 तक आते-आते ममता और धनखड़ के बीच रिश्तों में इतनी तल्खी आ गई कि राज्य सरकार यह विधेयक ले आई कि राज्य के विश्वविद्यालयों का चांसलर अब राज्यपाल नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री रहेगा। बंगाल में भाजपा की अगर मजबूत जमीन तैयार हुई तो उसके पीछे धनखड़ का भी अहम रोल माना जा रहा है। यही कारण है कि धनखड़ पार्टी हाईकमान एवं प्रधानमंत्री मोदी के पसंदीदा राज्यपालों में से एक रहे। ममता का मुकाबला करने की क्षमता और जाट नेता होने की वजह से धनखड़ भाजपा के लिए उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में पहली पसंद बने। दरअसल, बंगाल में जहां-जहां भाजपा नहीं पहुंच पाई, वहां धनखड़ ने बतौर राज्यपाल ने संवाद साधने की कोशिश की। दूसरी तरफ, जब एक और जाट नेता व वर्तमान में मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक केंद्र सरकार के खिलाफ इन दिनों मुखर हैं तो धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने जाट समुदाय को साधने की कोशिश की है।

जाट चेहरा और किसान
जगदीप धनखड़ राजस्थान के रहने वाले हैं, किसान परिवार से हैं और जाट समुदाय से आते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन में जाट किसान भी बड़ी तादाद में शामिल थे। इसके अलावा राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोटरों और किसानों की संख्या अच्छी-खासी है। कई निर्वाचन क्षेत्रों में जाट वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजस्थान में तो अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं। गौर करने वाली बात यह है कि धनखड़ की उम्मीदवारी का ऐलान करते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें किसान पुत्र कहकर संबोधित किया। राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसके माध्यम से भाजपा किसानों को साधने की कोशिश कर सकती है। दरअसल, किसान आंदोलन के बाद किसानों का रुख भाजपा के प्रति सख्त बताया जा रहा है।

सियासी हलकों में हलचल मचा दी
भाजपा ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करके सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। दरअसल, एनडीए की ओर से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में अब तक धनखड़ के नाम पर चर्चा नहीं थी। उन्हें प्रबल दावेदार तक नहीं माना जा रहा था। दावेदारों में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह आदि नाम सुर्खियों में थे।

राजस्थान विधानसभा चुनाव पर नजर
अगले साल यानी 2023 में राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए यह अहम फैसला होगा। धनखड़ के बहाने भाजपा राजस्थान की सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर सकती है। दरअसल, राजस्थान में वसुंधरा राजे गुट नाराज चल रहा है। वहीं, एनडीए के सहयोगी हनुमान बेनीवाल भी अग्निपथ योजना को लेकर भाजपा से नाराज नजर आए थे। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा नए चेहरे पर दांव खेल सकती है, जिसके लिए पार्टी को सीधे तौर पर आम जनता के समर्थन की जरूरत है। ऐसे में धनखड़ का चेहरा भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है।

राजनीतिक दांव-पेच और कानून के खिलाड़ी  हैं धनखड़

किसान, वकील और फिर नेता बने जगदीप धनखड़ कानून, सियासत, सियासी दांव-पेच के बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं। हर राजनीतिक दल में अपने संबंधों को कायम करने की महारत के लिए भी जाने जाते हैं। वह राजस्थान की जाट बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने राजस्थान में जाटों को आरक्षण दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी। यही कारण है कि जाट समुदाय में धनखड़ की काफी अच्छी पकड़ है। इस समुदाय में धनखड़ की खासी साख है। भाजपा उनके जरिए जाटों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
धनखड़ सिर्फ नेता ही नहीं, बल्कि जाने-माने वकील भी हैं। वह सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और राजस्थान हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। जगदीप धनखड़ का जन्म झुंझुनूं जिले के गांव किठाना में साल 1951 में साधारण किसान परिवार में हुआ था। धनखड़ ने राजस्थान विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। वे राजस्थान बार काउंसिल के चेयरमैन भी रहे थे।

BJP से पहले जनता दल और कांग्रेस में भी रह चुके हैं धनखड़

राजस्थान के झुंझनू से ताल्लुक रखने वाले जगदीप धनखड़ केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। वह झुंझुनूं से 1989 से 91 तक जनता दल से सांसद रहे। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। वह अजमेर से कांग्रेस टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2003 में धनखड़ भाजपाई हो गए। साथ ही अजमेर के किशनगढ़ से विधायक बने।  70 साल के जगदीप धनखड़ को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 30 जुलाई 2019 को बंगाल का 28वां राज्यपाल नियुक्त किया था।

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