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Sunday, May 22, 2022

पश्चिम में खौफ, पलायन और दंगो की याद पर होगा मतदान…होगा खेला

बसंती बयार के बीच सूबे में चुनावी अंधड़ चलने लगी है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, दंगा, गुंडागर्दी, पलायन, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार मिटाने, महंगाई, राम मंदिर, बाबा विश्वनाथ धाम, कृष्ण मंदिर से लेकर गर्मी-चर्बी और ’हिंदुगर्दी’, कानून का राज, जिन्नावाद व राष्ट्रवाद नेताओं जुबान पर है। खासकर पहले चरण में पश्चिमी इलाके के 15 जिलों की 73 सीटों के लिए होने वाले मतदान ने सियासी तपिश बढ़ा दी है और जब मतदान में तीन ही दिन बचे है तो दलों ने पूरी ताकत झोक रखी है। भाजपा, सपा-रालोद, कांग्रेस व बसपा समेत अन्य दलों के प्रत्याशी मैदान मारने के लिए हर हथकंडे अपना रहे हैं। लेकिन चुनावी के ध्रुवीकरण व जातीय गठजोड़ का मोड़ देने की कोशिशों ने सारे समीकरणों को उलझा दिया है। जबकि खामोशी की चादर ओढ़े मतदाताओं को इंतजार है तो बस 10 फरवरी की वोटिंग का। उनके जेहन में आज भी वह खौफनाक मंजर घूम रहा, जिसमें किसी ने अपने भाई को कटते देखा है तो बेटियों के संग दुष्कर्म। हो जो भी यहां के लोगों में साम्प्रदायिकता, पलायन, दंगा ही मुद्दा है और दलों ने भी इसी के इर्द-गिर्द अपना चुनावी मुद्दा बना रखा है

(सुरेश गांधी)
आज से ठीक तीसरे दिन यानी 10 फरवरी को पश्चिम के 11 जिलों में पहले फेज की वोटिंग होगी। यहां 58 विधानसभा सीटों पर कुल 623 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वैसे भी पश्चिम यूपी को चुनावी प्रयोगशाला कहा जाता है। यहां हर बार राजनीति किसानों के मसले से शुरू होती है और चुनाव की चैखट पर पहुंचते-पहुंचते ध्रुवीकरण का रसायन गाढ़ा होने लगता है। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद चुनावी जंग में बयानों के तीरों की संख्या बढ़ी। 2014 लोस, 2017 विस एवं 2019 लोक चुनावों में भाजपा को एकतरफा जीत मिली। गठबंधन बने और बिगड़े। अब सपा मुखिया अखिलेश यादव एवं रालोद मुखिया चैधरी जयंत सिंह ने हाथ मिलाकर पश्चिम में भाजपा को घेरने का प्रयास किया है। लेकिन इस बार चुनावी हवा में बयानों की आंच ज्यादा महसूस हो रही है। अखिलेश यादव के जिन्ना वाले बयान के बाद गर्मी, चर्बी व हिदूगर्दी पर आ टिकी है। भाजपा ने बाबा के बुलडोजर सहित कानून व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बना हुआ है। इसी पर सियासी पार्टियां मैदान में जंग लड़ते देखी जा सकती हैं। सत्तारूढ़ दल के सारे बड़े नेता ने इसी मुद्दे को लेकर पिच में डटे हैं। जबकि विपक्षी साम्प्रदायिकता, नफरत फैलाने की बात कहकर माहौल को अपने पक्ष में करने की भरपूर कोशिश में जुटे है। मतलब साफ है पश्चिम यूपी की राजनीतिक तपिश ऐसी कि चुनावी जंग में खेतीबाड़ी के मुद्दे मुरझा गए, और धु्रवीकरण की नई फसल खड़ी हो गई। दिग्गजों के बयानों ने चुनावी मौसम को गर्म कर दिया है।

जहां सीएम योगी का मई-जून में शिमला बना देने का बयान सुर्खियों में है, वहीं रालोद मुखिया ने ’भाजपा की चर्बी उतार लेने’ की बात कहकर राजनीतिक खिंचाव को साबित कर दिया।
बता दें, पश्चिम उप्र में बयानबाजी की आंच पूरब तक असर करेगी। यही वजह है कि अब कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर धुव्रीकरण कराने का प्रयास हो रहा है। 2013 में हुए मुजफ्फर नगर के दंगों की यादे ताजा की जा रही हैं। भाजपा की ओर से बताने का प्रयास हो रहा है कि पहले की तस्वीर क्या थी अब क्या बदलाव हुए हैं। हलांकि यह मुद्दे कितने मुफीद हांेगे यह तो 10 मार्च के बाद पता चलेगा। लेकिन सच यही है कि बीजेपी और सपा-रालोद गठबंधन के बीच कहीं कांटे की टक्कर है तो कहीं कांग्रेस और बसपा के अलावा असदुद्दीन ओवैसी भी लड़ाई को त्रिकोणीय व बहुकोणिय बनाते दिख रहे है और मुसलिम मतदाताओं को अपने तरीके से रिझाने के लिए पूरे दमख़म के साथ जुटे हुए हैं। हाल ही में ओवैसी पर हुए हमले से यहां का राजनीतिक माहौल कुछ ज़्यादा ही गरमा गया है। ये सवाल उठना लाज़िमी है कि आखि़र मतदान से ठीक पहले ओवैसी क्यों चर्चा का केंद्र बन गए हैं? दूसरा सवाल ये है कि क्या ओवैसी पर हुए हमले से पश्चिम यूपी के सिसायी समीकरण बिगड़ सकते हैं? हालांकि लोकसभा चुनाव में टर्निंग प्वाइंट बने पश्चिमी यूपी से ही भाजपा सबसे ज्यादा उम्मींदे लगाएं है। बेशक, पश्चिम मुस्लिम बहुल इलाका है। 10 फरवरी को होने वाले मतदान में दंगे झेल चुके मुजफ्फरनगर और शामली के अलावा मेरठ, आगरा, मथुरा, नोएडा, बुलंदशहर, सिकंदराबाद, बागपत, फतेहपुर सीकरी, एटा आदि क्षेत्र शामिल हैं। देखा जाएं तो यहां सबसे बड़ा मुद्दा खौफ, पलायन, गुंडागर्दी, दंगों की याद व सांप्रदायिकता ही है। चाहे फिर मतदाता इसके पक्ष में हो या फिर विरोध में।
सभी प्रमुख दलों के नेता विकास की बात तो कर रहे हैं लेकिन मौका मिलते ही वह हिंदू-मुस्लिम मतों के मसले को भी उठाते हैं। अधिकांश हिस्सा मुज्जफरनगर दंगों से प्रभावित दिख रहा है। सांप्रदायिक तनाव अब इस क्षेत्र में आम हो गया है। इस बार भी बीजेपी कैराना की याद दिला रही है…जिन्नावाद के आरोप लगा रही है। दंगे-अपराध और तमंचावाद की बात कर रही है। वहीं सपा-रालोद गठबंधन के अलावा ओवैसी, कांग्रेस व बसपा मुस्लिम वोटों के भरोसे है। बसपा अधिकतर सीटों पर मुस्लिम दलित समीकरण के साथ लड़ रही है। सपा-रालेाद गठबंधन पर लोगों का कहना है कि सपा ने गठबंधन का दांव मुस्लिमों को अपने पक्ष में बिखरने से रोकने के लिए चला है। कहा जा सकता है गठबंधन कई इलाके में जातिगत समीकरण बिगाड़ने में जुटा है तो कांग्रेस भी कई सीट पर वोटकटवा के रूप में नजर आ रही है। बता दें, पश्चिमी यूपी ने पीएम मोदी को प्रधानमंत्री बनाने से लेकर योगी को सीएम बनाने में एक अहम भूमिका निभाई है। और इस बार भी पीएम मोदी से लेकर अमित शाह, जेपी नड्डा समेत बीजेपी के कई नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। पश्चिमी यूपी में सहारनपुर, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल, रामपुर, अमरोहा, मेरठ, बाग़पत, ग़ाज़ियाबाद, हापुड़, गौतम बुद्ध नगर और बुलंदशहर जिले आते हैं। वहीं, अगर इस क्षेत्र में अहम सीटों की बात करें यहां कैराना, मुजफ्फरनगर, खतौली, नगीना, नजीबाबाद, मुरादाबाद, चंदौसी, देवबंद, सहारनपुर, हसनपुर, मेरठ, मुरादनगर, लोनी, गाजियाबाद, मोदीनगर, नोएडा, दादरी, जेवर, धौलाना, हापुड़ शामिल हैं जहां पहले चरण और दूसरे चरण के लिए 10 फरवरी और 14 फरवरी को मतदान होना है।

2017 का पार्टियों को मिला वोट शेयर
-भाजपा – 41 फीसदी
– सपा- 22 फीसदी
– बीएसपी- 21 फीसदी
– कांग्रेस – 8 फीसदी
– अन्य- 8 फीसदी

वर्ष 2017 में पश्चिम यूपी में किसे मिलीं कितनी सीटें
भाजपा – 52 सीट
स्पा -15 सीट
कांग्रेस – 2 सीट
बीएसपी- 1 सीट
अन्य – 1 सीट

पश्चिमी यूपी का गणित
पश्चिमी यूपी में लोकसभा की 27 सीटें हैं। 2014 में बीजेपी ने 27 में से 24 सीटें जीती थीं। इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी यहां 19 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को सत्ता दिलाने में पश्चिमी यूपी की मुख्य भूमिका थी, क्योंकि यहां विधानसभा की 136 में से 109 सीटें बीजेपी ने जीती थीं।

मुस्लिम-जाट और यादव
वेस्टर्न यूपी में इस बार सपा और रालोद का गठबंधन है। मुस्लिम, जाट और यादव वोट मिलकर ही 51 फीसदी हो रहे हैं। यही वजह है कि बीजेपी चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रही है। योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि ये चुनाव 80 बनाम 20 का होगा, 80 फीसदी समर्थन एक तरफ होगा, 20 फीसदी दूसरी तरफ होगा। मुझे लगता है कि 80 प्रतिशत सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेंगे, 20 फीसदी हमेशा विरोध करने वाले हैं, विरोध करेंगे, लेकिन सत्ता बीजेपी की आएगी। बीजेपी फिर सबका सबके विकास अभियान को आगे बढ़ाने का काम करेगी। मतलब साफ है योगी 80 प्रतिशत हिंदू बनाम 20 प्रतिशत मुसलमानों की बात करते हैं? हालांकि योगी इसे 80 प्रतिशत सीटों पर बीजेपी जीतेगी और 20 प्रतिशत पर सपा, बसपा कांग्रेस जैसी पार्टियां होंगी की बात करते है। बता दें, यूपी में करीब 20 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। 143 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट्स का प्रभाव है। 107 सीटों पर मुस्लिम मतदाता जीत-हार तय करते हैं। 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत हैं। 43 सीटों पर मुस्लिम जनसंख्य़ा 30 प्रतिशत से ज्यादा है। 36 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम प्रत्याशी अपने दम पर जीत सकता है। पश्चिमी यूपी में 9 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम प्रत्याशी आसानी से जीत सकता है। सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीट रामपुर है, जहां 50 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान हैं। अब बीजेपी को ये डर है कि अगर अखिलेश और जयंत के गठबंधन से मुसलमान और जाट वोट एक तरफ हो गए और उनके साथ यादव और दूसरी जातियां भी मिल गईं तो फिर बीजेपी के लिए कुछ नहीं बचेगा। इसीलिए बीजेपी पश्चिमी यूपी में अपना सबकुछ दांव पर लगा दी है।

कानून का राज ही बना मुद्दा

पश्चिम किसान आंदोलन की वजह से प्रभावित रहा है। इस बार किसान आंदोलन और सपा और रालोद के गठबंधन से यहां भाजपा को चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। भाजपा की ओर से गृहमंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, राजनाथ और योगी ने कमान संभाल रखी है। अमित शाह ने कैराना से प्रचार की शुरूआत की और पलायन का मुद्दा लोगों को याद दिलाया। इसके बाद बुलंदशहर,अलीगढ़ में मफिया अपराधी कानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष को घेरने में लगे हैं। इसके अलावा उनके निशाने पर सपा के प्रत्याशियों की सूची हैं, जिसे बार-बार याद दिलाकर लोगों को झकजोर रहे हैं। साथ ही मुजफ्फरनगर के दंगों की याद दिला रहे हैं। यह भी बता रहे हैं कि 2014, 2017 फिर 2019 में क्या क्या बदलाव हुए हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद भाजपा को सत्ता मिली थी। शाह ने मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए कहा कि वो आज भी दंगों की पीड़ा को भूल नहीं पाए हैं। शाह ने आगे कहा कि अखिलेश सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे के समय पीड़ितों को आरोपी और आरोपियों को पीड़ित बना दिया। अखिलेश और जयंत के गठबंधन पर निशाना साधते हुए शाह ने कहा कि जयंत और वे साथ-साथ हैं। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि सिर्फ मतगणना तक ही दोनों साथ-साथ हैं। सरकार बनते ही अखिलेश जयंत को बाहर कर देंगे और आजम खान को अपने बगल में बैठा लेंगे। इसके बाद आपको आजम और अतीक ही दिखाई देंगे।जबकि सपा-रालोद दोनों अन्न की पोटली के जरिए किसानों के मुद्दे को जिंदा रखने का प्रयास कर रहे हैं।

ओवैसी पर हमले से गरमाई राजनीति

ओवैसी पर हमले का मामला संसद में गूंजा। आनन-फानन में मोदी सरकार ने उन्हें ज़ेड सुरक्षा देने का ऐलान कर दिया। लेकिन ओवैसी ने लोकसभा में सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें सुरक्षा नहीं बल्कि इंसाफ चाहिए। ओवैसी ने यह कहकर संविधान और लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई कि उन पर ‘बुलेट’ चलाने वालों को जनता ‘बैलेट’ पेपर से जवाब देगी। ओवैसी पर हमले के अगले दिन उनकी पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और केंद्र सरकार से उन्हें सुरक्षा देने की मांग करने लगे। इससे मुसलिम समाज में ओवैसी के प्रति सहानुभूति लहर देखी जा रही है। इस लहर के वोटों में तब्दील होने की आशंका से मुसलिम वोटों के सहारे योगी सरकार को उखाड़ फेंकने का दावा कर रहे अखिलेश यादव की धड़कन बढ़ गई हैं।

ध्रुवीकरण की साज़िश

ओवैसी पर हमला पश्चिम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की साज़िश हो सकती है। पहले चरण में मतदान वाली सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। पहले चरण की 58 में से 12 सीटों पर ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इनमें से मुज़फ्फनगर और मेरठ की तीन-तीन, ग़ाजियाबाद में दो, हापुड़ में दो सीटों पर ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार ताल ठोक रहे हैं। इनके अलावा बुलंदशहर और अलीगढ़ ज़िले में एक-एक सीट पर उनकी पार्टी का उम्मीदवार किस्मत आज़मा रहा है। ओवैसी के उम्मीदवार कहीं सपा-रालोद गठबंधन के मुसलिम उम्मीदवार की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं तो कहीं बसपा और कांग्रेस के। ये स्थिति बीजेपी को राहत देने वाली है।

क्या कहते है मतदाता

संजय राठी ने कहा कि सभी दल धु्रवीकरण से लेकर अन्य सभी दांवपेचों का इस्तेमाल कर रहे हैं। बसपा भी सोशल इंजीनियरिंग में जुटी हुई है। इस जद्दोजहद में सुरक्षा और कृषि कानून के मुद्दे तो जोर-शोर से उठ रहे हैं, पर अन्य अहम मुद्दे कहीं पीछे छूट रहे हैं। अब तो हर दांवपेच आजमाए जा रहे हैं। भाजपा जहंा सुरक्षा के मुद्दे को बड़ा बनाए हुए है, तो सपा-रालोद गठबंधन किसानों के मुद्दों को उठाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।

मुद्दे गयाब

कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं जिनकी चुनाव के शुरुआत में खूब चर्चा हुई। पर, अब इन मुद्दों की तपिश वैसी नहीं दिख रही।अब तो चुनाव सुरक्षा के मुद्दे और ध्रुवीकरण की तरफ जाता नजर आ रहा है।

महंगाई: शुरू में महंगाई का मुद्दा चरम पर रहा था। विपक्षियों ने इसपर सरकार को खूब घेरा। खासकर डीजल-पेट्रोल के दामों को लेकर। कहा जाता रहा कि महंगाई किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है। कीटनाशक, उर्वरक के दामों से फसलों की लागत बढऩे का भी मुद्दा काफी समय तक गर्म रहा। पर, चुनावी गर्मी बढ़ते ही चर्चाओं में महंगाई का मुद्दा मंदी का मारा हो गया है।

रोजगार: विपक्षी दलों केएजेंडे में रोजगार बड़ा मुद्दा था। सरकार पर लगातार आरोप लगे कि युवाओं को नौकरियां नहीं मिलीं। स्थानीय स्तर पर कोई नई फैक्टरी नहीं लगाई गई। जो कुछ रोजगार था वह कोरोना काल में चला गया, पर सरकार ने मदद नहीं की। पर, चुनावी शोर में इसको लेकर भी कम आवाजें सुनाई दे रही हैं।

छुट्टा पशु: कई सालों से छुट्टा पशुओं का मुद्दा गूंजता रहा। हालांकि, सरकार ने गौशालाएं बनाकर भरपाई करने की कोशिश की। कहा कि प्रति गोवंश प्रति माह 930 रुपये सरकार देगी और कोई भी गोवंश का भरण-पोषण कर सकता है, पर लोगों ने इसे नाकाफी बताया। आलम यह रहा कि छुट्टा पशुओं का मुद्दा बढ़ता ही गया। ध्रुवीकरण के दौर में यह मुद्दा भी अब उतना नहीं सुनाई दे रहा।

स्वास्थ्य सेवाएं : जिला अस्पतालों की बदतर स्थितियां खूब मुद्दा बनीं। कोरोना काल में हालात बिगड़ तो सरकार पर ठीकरा फोड़ा गया। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का खूब शोर रहा, पर जब चुनाव सिर पर आए तो इस मुद्दे का शोर अब कुछ कम सुनाई दे रहा है।

गन्ना बकाया भुगतान एवं मूल्य: चुनावी शोर में गन्ना बकाया एवं मूल्य का मुद्दा कहीं दबता नजर आ रहा है। पहले गन्ने का मुद्दा खूब जोर-शोर से उठ रहा था। किसानों का पिछले सत्र का बकाया अब तक शत-प्रतिशत चुकाया नहीं गया है। किसान गन्ने का मूल्य कम बता रहे हैं। सरकार ने 25 रुपये की वृद्धि की पर किसानों ने इसे नाकाफी ही बताया।

 

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