वाराणसी/सुरेश गांधी: वाराणसी की आध्यात्मिक धड़कनों के बीच, जहां हर गली में इतिहास सांस लेता है और हर मंदिर में भक्ति गूंजती है, वहीं संकट मोचन संगीत समारोह की एक भावभीनी रात साक्षी बनी, संगीत, साधना और समर्पण के अद्भुत संगम की। इस पावन अवसर पर पचास वर्षों की तपस्या, पंजाब की सूफियाना मिट्टी, काशी की भक्ति और जीवन-दर्शन, पद्मश्री गायिका जसपिंदर नरूला ने न केवल अपनी प्रस्तुति से वातावरण को राममय किया, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों और संगीत यात्रा के रहस्यों को वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के साथ साझा किया। यह संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं, बल्कि एक कलाकार की आत्मा से निकली वह यात्रा है, जिसमें संघर्ष है, श्रद्धा है, और अंततः एक गहरा संतोष भी, सुरों की साधना ने उन्हें वहां पहुंचाया, जहां संगीत ईश्वर का माध्यम बन जाता है। प्रस्तुत है उनसे हुए बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः-

प्रश्न : संकट मोचन के इस पावन मंच पर गाने का अनुभव कैसा रहा?
जसपिंदर नरूला : काशी में गाना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है, एक जीवंत आध्यात्मिक ऊर्जा है। लेकिन जब बात संकट मोचन मंदिर की हो, तो यह अनुभव और भी गहरा हो जाता है। यहां गाना केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक अर्पण है। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं नहीं गा रही, बल्कि मुझसे गवाया जा रहा है। यहां हर सुर सीधे हनुमान जी तक पहुंचता है। आज मैंने जो भी गाया, वह मेरी ओर से एक विनम्र भेंट थी। कुछ वर्ष पहले जब मैं गंगा महोत्सव में आई थी, तब मैंने हनुमान जी के दरबार में माथा टेका था और मन ही मन एक मन्नत मांगी थी, एक दिन मुझे यहां भजन गाने का अवसर मिले। आज वह मन्नत पूरी हुई है। यह मेरे लिए अत्यंत भावुक क्षण है… ये खुशी के आंसू हैं।
प्रश्न : आपकी गायकी में सूफी, भक्ति और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह संतुलन कैसे संभव हुआ?
उत्तर : मैं पंजाब की मिट्टी से हूं, जहां सूफी संतों की परंपरा गहराई से जुड़ी हुई है। वहां का संगीत अपने आप में इबादत है। बचपन से ही मैंने यह सीखा कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा है। मैंने हमेशा अपनी मौलिकता को बनाए रखने की कोशिश की है। चाहे फिल्मी गीत गाऊं या भजन, मेरे लिए हर सुर एक साधना है। शायद यही कारण है कि मेरी गायकी में सूफियाना रंग भी है और भक्ति की गहराई भी।
प्रश्न : आपने फिल्मी दुनिया में अपार सफलता हासिल की, फिर भी भक्ति और शास्त्रीय संगीत से जुड़ी रहीं। इसका क्या कारण रहा?
उत्तर : लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन जड़ों से जुड़ाव स्थायी होता है। मैंने कभी अपने मूल को नहीं छोड़ा। शास्त्रीय संगीत मेरी नींव है और भक्ति मेरी आत्मा। फिल्मों में गाना मेरे करियर का हिस्सा है, लेकिन जब मैं भजन गाती हूं, तो वह मेरे भीतर की सच्ची अभिव्यक्ति होती है। यही मुझे संतुलित रखता है।
प्रश्न : “प्यार तो होना ही था” गीत ने आपके करियर को नई ऊंचाई दी। उस दौर को कैसे याद करती हैं?
उत्तर : प्यार तो होना ही था का वह गीत मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट था. रेमो फर्नांडीज के साथ गाया गया यह गीत आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। जब यह गीत आया, तो मुझे इतनी लोकप्रियता मिली, मैं खुद भी हैरान थी। लेकिन मैंने इसे सिर पर चढ़ने नहीं दिया, क्योंकि मुझे पता था कि असली यात्रा अभी बाकी है।
प्रश्न : आपके संगीत सफर की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर : मेरा संगीत से रिश्ता बचपन से ही है। मेरे पिता केसर सिंह नरूला स्वयं संगीतकार थे। उन्होंने ही मुझे संगीत की पहली शिक्षा दी। घर का माहौल ऐसा था कि हर दिन रियाज़ होता था। आगे चलकर मैंने उस्ताद गुलाम सादिक खान से प्रशिक्षण लिया। शास्त्रीय संगीत ने मेरी आवाज़ को आधार दिया। यही आधार आज तक मेरे साथ है।
प्रश्न : आपने अपने करियर में कई बड़े संगीतकारों के साथ काम किया। उस अनुभव को कैसे देखती हैं?
उत्तर : मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे कल्याणजी जैसे महान संगीतकार का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने मुझे इंडस्ट्री में आने का रास्ता दिखाया। इसके बाद विजू शाह और अन्य कई संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर मिला। हर अनुभव ने मुझे कुछ नया सिखाया।
प्रश्न : संकट मोचन में आपकी प्रस्तुति के दौरान “राम आएंगे” और “भज ले राम” जैसे भजनों ने लोगों को भाव-विभोर कर दिया। उस क्षण आपकी अनुभूति क्या थी?
उत्तर : जब मैं “राम आएंगे…” गा रही थी, तो मुझे लगा जैसे पूरा वातावरण राममय हो गया है। लोग झूम रहे थे, आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहे थे, वह दृश्य शब्दों में नहीं कहा जा सकता। “मनवा रे जीवन है संग्राम, भज ले राम…” यह केवल गीत नहीं, जीवन का सार है। जब हम कठिनाइयों में होते हैं, तो भक्ति ही हमें संभालती है। प्रभु हर दिल में हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि विश्वास है, जब हम सच्चे मन से पुकारते हैं, तो भगवान जरूर आते हैं। उस समय मैं खुद भी एक श्रोता बन जाती हूं और संगीत मुझे भीतर से छूता है।
प्रश्न : आपने युवाओं को मेहनत और ईश्वर में विश्वास का संदेश दिया। आज के समय में यह कितना जरूरी है?
उत्तर : आज की दुनिया बहुत तेज हो गई है। हर कोई जल्दी सफलता चाहता है, धैर्य की कमी दिखती है। लेकिन मैं यही कहना चाहूंगी कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मैंने 50 वर्षों तक लगातार मेहनत की है। यह कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं है। अगर आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं और अपने काम के प्रति ईमानदार हैं, तो सफलता जरूर मिलती है। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। जो लोग साधना से नहीं गुजरते, वे सफलता को टिकाकर नहीं रख पाते।
प्रश्न : काशी और यहां के श्रोताओं के बारे में आपका क्या अनुभव रहा?
उत्तर : काशी के श्रोता बहुत विशेष होते हैं। वे केवल सुनते नहीं, बल्कि महसूस करते हैं। यहां संगीत आत्मा से जुड़ जाता है। जब मैंने देखा कि लोग छतों पर, बाहर स्क्रीन के सामने खड़े होकर भी सुन रहे हैं, तो मुझे लगा कि यह केवल मेरा नहीं, बल्कि संगीत का सम्मान है।
प्रश्न : मंदिर के महंत से मुलाकात और काशी की पौराणिकता के बारे में जानकर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?
उत्तर : कार्यक्रम के बाद मेरी मुलाकात पंडित विश्वंभरनाथ मिश्र से हुई। उन्होंने मुझे काशी की परंपरा, गोस्वामी तुलसीदास और मंदिर की स्थापना की कथा सुनाई। उसे सुनकर मैं सच में भावुक हो गई। काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव है। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे यहां गाने का अवसर मिला।
फिरहाल, यह संवाद केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक साधिका की आत्मकथा का अंश है। उनका जीवन-दर्शन सामने आया, जहां संगीत, भक्ति और संघर्ष एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। जसपिंदर नरूला की आवाज़ में जो गूंज है, वह केवल सुरों की नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या, विश्वास और समर्पण की है। काशी की इस पावन भूमि पर उन्होंने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया, जब संगीत साधना बन जाता है, तो वह केवल सुना नहीं जाता… वह जिया जाता है। समारोह में उनकी प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि उनकी आवाज़ में आज भी वही ऊर्जा और भावनात्मक गहराई है। “भज ले राम… राम… राम…” जैसे भजनों की गूंज ने पूरे मंदिर परिसर को भक्तिमय बना दिया। श्रोता झूम उठे, और हर सुर के साथ आस्था का प्रवाह और प्रगाढ़ होता गया। उनकी गायकी में भाव, ऊर्जा और आध्यात्मिकता का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने श्रोताओं को भीतर तक स्पर्श किया। यह केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक साधना थी, एक ऐसी साधना, जिसमें सुर ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं।
संगीत अगर साधना बन जाए, तो वह सीधे आत्मा तक पहुंचता है
जसपिंदर नरूला का गायन केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है। वे उस परंपरा की प्रतिनिधि हैं, जिसने पंजाब के लोक, सूफी और शास्त्रीय संगीत की मौलिकता को सहेजते हुए उसे वैश्विक मंच तक पहुंचाया। आज जब पंजाबी संगीत दुनिया भर में अपनी धाक जमा रहा है, तो उसमें नरूला जैसे कलाकारों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपने फिल्मी सफर में “प्यार तो होना ही था” जैसे गीत से उन्होंने जो पहचान बनाई, उसने 90 के दशक की पूरी पीढ़ी को झूमने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत और भक्ति परंपरा से अपना नाता कभी नहीं तोड़ा। यही उनकी साधना की सबसे बड़ी विशेषता है। संकट मोचन मंदिर के पावन प्रांगण में उनकी प्रस्तुति इस साधना का सजीव उदाहरण बनी। उन्होंने “सतनाम वाहेगुरु” के उच्चारण के साथ जब “हे गोविंद, हे गोपाल” का भजन आरंभ किया, तो वातावरण में एक अद्भुत आध्यात्मिक कंपन महसूस हुआ। उनके स्वर में गुरबाणी की पवित्रता और भक्ति की गहराई स्पष्ट झलक रही थी। इसके बाद “मनवा रे जीवन है संग्राम, भज ले राम-राम… जैसे भजनों ने जीवन के संघर्षों के बीच भक्ति को सहारा बनाने का संदेश दिया। “सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को, मिल जाए तरुवर की छाया… जैसी पंक्तियों ने मानो श्रोताओं को शीतलता और सुकून का अनुभव कराया। “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोय… का गायन करते हुए उन्होंने रामभक्ति की उस निष्कपट आस्था को स्वर दिया, जो हर भय को समाप्त कर देती है। वहीं “हे गोविंद! हे गोपाल! दया निधान… जैसे भजनों में उनकी आवाज़ एक प्रार्थना बनकर गूंज उठी। कार्यक्रम के अंतिम चरण में जब उन्होंने “मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जाएंगे, राम आएंगे… का गायन शुरू किया, तो पूरा वातावरण भक्ति और उत्साह से भर गया। श्रोता झूम उठे, हाथ उठाकर प्रभु का स्मरण करने लगे और पूरा प्रांगण रामनाम के जयकारों से गूंज उठा।
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