– कोहरे की चादर –
दिसंबर कोहरे की चादर,
जनवरी को ओड़ा गया,,
अभी कड़ाके की ठंड बाकी है,
ये एहसास भी करा गया,,
अभी धरा पर कोहरे ने,
अपना अधिकार जमा रखा है,,
पेड़ – पौधे, पहाड़ ,झरने,
सबको अपनी आगोश में छुपा रखा है,,
सूर्य देव अभी छुप छुप कर,
बादलों से झांकेंगे,,
रजाई में सिमटे हुए हम,
खिड़कियों से ताकेंगे,,
अभी कोहरे की चादर,
हटने नहीं वाली है,,
ठंड से बचकर रहो,
बात जनहित में जारी है।


विभूति सिंह ‘विख्यात’
Very beautiful and soul touching poem