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Tuesday, January 27, 2026

UGC विवाद पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का स्पष्ट संदेश- ‘भरोसा देता हूं, किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा’

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने UGC के नए इक्विटी नियमों पर उठे विवाद के बीच पहला बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नए नियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और न ही कानून का दुरुपयोग होने दिया जाएगा। UGC ने 13 जनवरी 2026 को प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026) लागू किया, जिसका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकना है। लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों की ओर से विरोध हो रहा है, जिसमें ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका जताई जा रही है। मंत्री ने आश्वासन दिया कि पूरी प्रक्रिया संविधान के दायरे में और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होगी।

UGC के नए नियम क्या हैं?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026) नाम से नए नियम जारी किए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, लिंग, विकलांगता आदि आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है। नियमों के तहत SC, ST, OBC, EWS, महिलाओं और दिव्यांगजनों के साथ होने वाले किसी भी तरह के अन्याय को रोकने पर जोर दिया गया है।

हर उच्च शिक्षा संस्थान में Equal Opportunity Centre (EOC) बनाना अनिवार्य है। साथ ही, शिकायतों की जांच के लिए इक्विटी कमेटी गठित की जाएगी। ये कमेटी शिकायतों को सुनने, जांच करने और कार्रवाई सुझाने का काम करेगी। संस्थानों को नियमित रिपोर्ट UGC को भेजनी होगी। अगर कोई संस्थान नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC फंडिंग रोक सकती है या मान्यता भी वापस ले सकती है। ये नियम 2012 के पुराने दिशानिर्देशों की जगह लेते हैं और अब ये कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं।

विवाद की वजह क्या है?

नए नियमों में इक्विटी कमेटी के गठन को लेकर आपत्ति उठ रही है। कमेटी में SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगों के लिए कम से कम पांच सीटें आरक्षित हैं। लेकिन सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है। विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे शिकायतों की जांच में एकतरफा कार्रवाई हो सकती है।

कई छात्र और संगठन मानते हैं कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों-शिक्षकों को निशाना बनाने का हथियार बन सकते हैं। झूठी शिकायतों से परेशानी हो सकती है और कैंपस में अविश्वास का माहौल बनेगा। दिल्ली के कई कॉलेजों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में भी दाखिल हो चुकी हैं। आलोचकों का कहना है कि नियम शोषित और शोषक की धारणा पर आधारित लगते हैं, जो संतुलित नहीं है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ANI से बातचीत में कहा, “मैं बहुत विनम्रता से सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। भेदभाव के नाम पर किसी को कानून का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं होगा।”

उन्होंने आगे कहा कि UGC, भारत सरकार और राज्य सरकारें मिलकर कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करेंगी। मंत्री ने जोर दिया कि सारी व्यवस्था भारतीय संविधान के अंदर है। निर्दोष लोगों के फंसने की आशंका पर उन्होंने कहा, “यह विषय सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। मैं सभी को भरोसा दिलाता हूं कि किसी पर अत्याचार या भेदभाव नहीं होगा।”

नियमों का उद्देश्य और सरकार का रुख

सरकार का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षा में समानता और न्याय लाने के लिए हैं। पिछले सालों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें बढ़ी हैं। UGC का मानना है कि नए नियम कैंपस को सुरक्षित और समावेशी बनाएंगे। मंत्री ने स्पष्ट किया कि नियम न्याय सुनिश्चित करने के लिए हैं, न कि किसी को परेशान करने के लिए।

विवाद के बीच प्रदर्शन जारी हैं और कई जगहों पर छात्र सड़कों पर उतरे हैं। सरकार ने कहा है कि फीडबैक पर विचार किया जा रहा है। कुल मिलाकर, ये नियम उच्च शिक्षा में इक्विटी लाने की कोशिश हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व और दुरुपयोग की आशंका से बहस छिड़ी हुई है।

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