नई दिल्ली, 6 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को बड़ी राहत देते हुए एक 10 साल पुराने मामले में वरिष्ठ अधिकारी प्रवीण गौड़ द्विवेदी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह खारिज कर दिया है। यह फैसला रेलवे प्रशासन की स्वायत्तता और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामला अंबाला मंडल से जुड़ा है, जहां स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट (एसआरएम) द्वारा टिकट चेकिंग दस्ते की मांग पर अधिकारी ने इनकार किया था, जिसके बाद उन पर आईपीसी की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि
यह विवाद 30 सितंबर 2016 को शुरू हुआ था। अंबाला के स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ने अंबाला मंडल की तत्कालीन वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (वरिष्ठ डीसीएम) प्रवीण गौड़ द्विवेदी से औचक टिकट चेकिंग के लिए एक समर्पित दस्ता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। उस समय मंडल में महत्वपूर्ण कार्यों के कारण स्टाफ की कमी थी। प्रवीण गौड़ द्विवेदी ने जवाब में बताया कि स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट दस्ते के लिए कोई स्वीकृत पद नहीं है। उन्होंने भारतीय रेलवे अधिनियम 1989 का हवाला देते हुए कहा कि टिकट चेकिंग एक कार्यकारी कार्य है, जो वाणिज्य विभाग के समन्वय से किया जाना चाहिए, न कि न्यायपालिका द्वारा सीधे मांगा जाए।
आपराधिक कार्यवाही की शुरुआत
एसआरएम ने इस इनकार से असंतुष्ट होकर प्रवीण गौड़ द्विवेदी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 186 (सरकारी कार्य में बाधा), 187 और 217 (निर्देशों की अवज्ञा) के तहत कार्यवाही की चेतावनी दी गई। इसके बाद निचली अदालतों में मामला चला और प्रक्रिया शुरू हो गई। अधिकारी ने इसे अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में बाधा बताया और उच्च न्यायालय से राहत मांगी।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई
मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कुछ आदेश दिए गए। बाद में महाप्रबंधक उत्तर रेलवे, रेलवे बोर्ड के सचिव और प्रवीण गौड़ द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की। याचिका में तर्क दिया गया कि यह कार्यवाही एक ईमानदार अधिकारी को परेशान करने के समान है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान निचली अदालतों के विवादित आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसआरएम अपने ही मामले में जज नहीं बन सकते। अधिकारी ने आधिकारिक क्षमता में ही फैसला लिया था, कोई व्यक्तिगत गलती नहीं थी।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट प्रशासनिक मांगों को लागू करने या टिकट चेकिंग जैसे कार्यकारी कार्यों की निगरानी के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकते। यह निर्णय लगभग 10 वर्षों से मानसिक तनाव झेल रही आईआरटीएस अधिकारी प्रवीण गौड़ द्विवेदी को पूरी तरह बरी करता है। साथ ही, यह रेलवे की प्रशासनिक स्वतंत्रता, अनुशासन और कार्यप्रणाली की रक्षा करता है। भविष्य में ऐसे मामलों में ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक न्यायिक दबाव से सुरक्षा मिलेगी।
यह फैसला रेलवे विभाग के लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि न्यायिक हस्तक्षेप कार्यकारी निर्णयों में सीमित रहना चाहिए। प्रवीण गौड़ द्विवेदी की लगातार कानूनी लड़ाई ने रेलवे के संस्थागत हितों को मजबूत आधार प्रदान किया है।

