नई दिल्ली, 27 फरवरी। भगवद्गीता को केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन और प्रशासन के लिए सर्वोत्तम प्रबंधन शास्त्र बताते हुए गीता मनीषी महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि इसके कर्मयोग के सिद्धांत अपनाने से कार्यक्षमता बढ़ती है और तनाव कम होता है। नई दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में ‘प्रशासन में श्रीमद्भगवद्गीता की भूमिका’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में उन्होंने यह बात कही।
कार्यक्रम की शुरुआत निवासी आयुक्त आर. विमला की पहल पर हुई, जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारी और विद्वान शामिल हुए। स्वामी जी ने जोर दिया कि गीता विचारों को सकारात्मक बनाती है और प्रशासकों को निष्पक्षता व जनहित के साथ कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देती है।
भगवद्गीता: जीवन और प्रशासन का व्यावहारिक मार्गदर्शक
स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने अपनी ओजस्वी शैली में कहा कि मनुष्य की असली समस्या परिस्थितियां नहीं, बल्कि उसके विचार होते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे गाड़ी की दिशा स्टियरिंग से बदलती है, वैसे ही जीवन की दिशा मन के विचारों से तय होती है। भगवद्गीता इन विचारों को सकारात्मक और सृजनशील बनाती है, जिससे व्यक्ति की क्षमताएं विकसित होती हैं। उन्होंने आज के समय में बच्चों पर परीक्षा के दबाव की चर्चा की और गीता के प्रसिद्ध मंत्र ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का जिक्र करते हुए कहा कि फल की चिंता छोड़कर कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने से अच्छे परिणाम खुद-ब-खुद मिलते हैं।

प्रशासन में गीता के सिद्धांतों की प्रासंगिकता
कार्यक्रम में स्वामी जी ने प्रशासनिक जीवन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि तनाव और नैतिक दुविधाओं से निपटने के लिए गीता का ज्ञान बहुत उपयोगी है। जब कोई अधिकारी निष्पक्ष होकर केवल जनहित में काम करता है, तो लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गीता एक उत्तम प्रबंधन शास्त्र है, जो कार्य संस्कृति को तनावमुक्त बनाने में मदद करती है।
महाराष्ट्र की संत परंपरा और गीता का व्यावहारिक रूप
पूर्व कुलपति डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने महाराष्ट्र की संत परंपरा की सराहना की। उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव और समर्थ रामदास ने गीता के उपदेशों को आम जनता तक पहुंचाया। लोकमान्य तिलक ने ‘गीतारहस्य’ लिखकर कर्मयोग को समझाया, जबकि विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन से इसे जीकर दिखाया। डॉ. आहूजा ने कहा कि यदि प्रशासन में यह सेवा भाव आए, तो समाज का हित संभव है।

वरिष्ठ अधिकारियों के विचार
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुमेधा कटारिया और आर. राजन ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निर्णय लेते समय या मानसिक संघर्ष में भगवद्गीता सच्चा मार्गदर्शक बनती है। निवासी आयुक्त आर. विमला ने कार्यक्रम की शुरुआत में कहा कि भागदौड़ भरे प्रशासनिक जीवन में आध्यात्मिक विचारों से मानसिक शांति और समर्पण मिलता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों को गीता की प्रतियां वितरित की गईं और शांति मंत्र के साथ समापन हुआ। यह आयोजन गीता के व्यावहारिक महत्व को प्रशासनिक क्षेत्र में रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण कदम रहा।
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