मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय शोधार्थी समागम 2026 को संबोधित करते हुए कहा कि शोध सिर्फ अकादमिक काम नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सोच बदलने वाली ताकत है। उन्होंने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे ऐसे रिसर्च करें जो सबकी सोच में नई दिशा लाएं। मुख्यमंत्री ने दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के रिसर्च फेलोशिप पोस्टर, वेबसाइट और 7 पुस्तकों का विमोचन किया। साथ ही “Mahakal: The Master of Time” वेबसाइट और 41वें मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक सम्मेलन के पोस्टर का भी लोकार्पण किया।
यह तीन दिवसीय समागम 14 फरवरी तक चलेगा, जिसमें देशभर से शोधार्थी, शिक्षाविद और विशेषज्ञ शामिल होकर शोध, विज्ञान और नवाचार पर चर्चा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने मध्य प्रदेश को शोध और नवाचार में अग्रणी राज्य बनाने की प्रतिबद्धता जताई।
मुख्यमंत्री का मुख्य संदेश: शोध से बदले सोच और दिशा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा, “शोध अकादमिक गतिविधि मात्र नहीं है, यह समाज और राष्ट्र की दिशा बदलने वाली शक्ति है। कोई भी शोध इतना उच्च स्तर का होना चाहिए कि वह हम सबकी सोच को नई दृष्टि और नई दिशा दे।” उन्होंने शोधार्थियों से अपील की कि वे निर्भीक होकर देश के विकास के लिए अपनी जिज्ञासा और रुचि के क्षेत्रों में काम करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है, वैसे ही शोध विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धतियों का जनक है। जब मानवीय प्रज्ञा में वैज्ञानिक ज्ञान जुड़ता है, तो वह ‘प्रज्ञान’ बन जाता है।
मध्य प्रदेश को शोध में आगे लाने की प्रतिबद्धता
डॉ. यादव ने बताया कि विज्ञान के विकास में ही देश का समग्र विकास छिपा है। सरकार मध्य प्रदेश को शोध और नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि शोध समाज के विकास का आधार है। इसे आधुनिक, परिष्कृत और परिमार्जित तरीके से आगे बढ़ाना चाहिए। शोधार्थियों को सलाह दी कि वे पुरानी धारणाओं में न बंधें, बल्कि नए विचारों और वैज्ञानिक नजरिए से ऐसे काम करें जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाएं।
भारतीय संस्कृति में शोध की परंपरा
मुख्यमंत्री ने जोर दिया कि भारतीय संस्कृति में एकल शोध की परंपरा नहीं रही, बल्कि शोध हमेशा समग्र कल्याण और राष्ट्र के हित पर आधारित रहा है। दुनिया के ज्ञान पर पश्चिम का प्रभाव पड़ा है, जिससे हमारी संस्कृति भी प्रभावित हुई। लेकिन हमें शोध को समाज आधारित रखना चाहिए, जिसमें राष्ट्र कल्याण की बात हो। दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान इस समागम के जरिए शोधार्थियों को नई दिशा दे रहा है।
अन्य वक्ताओं के महत्वपूर्ण विचार
पूज्य आचार्य श्री मिथलेशनन्दिनीशरण महाराज ने कहा कि मध्य प्रदेश ने महाकाल की प्रतिष्ठा से दुनिया को परिचित कराया है। शोधार्थी बोधार्थी भी हैं। शोध अगर बोध तक न ले जाए तो व्यर्थ है। ज्ञान चिंतन आधारित होता है, डाटा आधारित नहीं। हमें पश्चिम से डरने की जरूरत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और चरित्र पर आधारित शोध करना चाहिए।
वरिष्ठ लेखक श्री सुरेश सोनी ने बीज वक्तव्य में कहा कि भारत के भौगोलिक स्वरूप में वेद आधारित सांस्कृतिक परिदृश्य दिखता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने विदेशी मूल्यों से मुक्ति की बात कही थी। पिछले 150-200 सालों में यूरोप आधारित शिक्षा लागू हुई। अब शोधार्थी कला, संस्कृति, न्याय, अर्थव्यवस्था जैसे विषयों पर भारतीय पद्धति से काम करें। आयुर्वेद में पदार्थ के 5 स्तर बताए गए हैं, हमें भारतीय दृष्टि से अध्ययन करना चाहिए।
प्रो. मधुकर एस पड़वी ने कहा कि भारत के पुनरोत्थान के लिए सभ्यता और ज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा जरूरी है। शोध व्यक्तिगत नहीं, सहयोगात्मक होना चाहिए और स्वदेशी दृष्टि अपनानी चाहिए।
उच्च शिक्षा एवं आयुष मंत्री श्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि यह समागम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत भारत केंद्रित शोध को बढ़ावा दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत @2047 का संकल्प है, जिसके लिए भारत केंद्रित शिक्षा और शोध से विश्व गुरु बनेंगे।
कार्यक्रम की झलकियां और अन्य गतिविधियां
समागम की संयोजिका डॉ. अल्पना त्रिवेदी ने स्वागत उद्बोधन दिया। विषय प्रवर्तन डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने किया। संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक पाण्डेय ने विषय वस्तु पर प्रकाश डाला। उद्घाटन सत्र के बाद मुख्यमंत्री ने विज्ञान भवन परिसर में पौधरोपण भी किया। मैपकास्ट के अध्यक्ष डॉ. अनिल कोठारी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी समेत कई शिक्षक और शोधार्थी मौजूद थे।

