लखनऊ। महाकुंभ के सफल आयोजन से मिले बड़े आर्थिक नतीजों ने केंद्र सरकार को भारत की पुरानी आर्थिक सोच की ओर नए तरीके से देखने को मजबूर कर दिया है। केंद्रीय बजट 2026-27 में पहली बार सनातन अर्थशास्त्र को स्पष्ट नीतिगत मान्यता मिली है। इसमें उत्सवधर्मिता, टेम्पल टूरिज्म और कस्बा आधारित अर्थव्यवस्था को मुख्य जगह दी गई है। यह साफ संकेत है कि अब भारत का विकास सिर्फ बड़े उद्योगों और महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ेगा।
महाकुंभ बना आस्था के साथ अर्थव्यवस्था का बड़ा मॉडल
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रयागराज में हुआ महाकुंभ सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि एक विशाल आर्थिक इंजन साबित हुआ। यूपीडीएफ के अध्यक्ष पंकज जायसवाल बताते हैं कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज, काशी और अयोध्या के सर्किट में होटल, ट्रांसपोर्ट, स्थानीय दुकानें, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं और लॉजिस्टिक्स सब मिलकर एक मजबूत आर्थिक तंत्र बना। लाखों श्रद्धालुओं के आने से स्थानीय व्यापार चरम पर पहुंचा और जीडीपी में बड़ा योगदान हुआ। इसी अनुभव से नीति निर्माताओं को समझ आया कि आस्था आधारित आयोजन जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था को तेजी दे सकते हैं। महाकुंभ ने साबित कर दिया कि धार्मिक आयोजन आर्थिक विकास के लिए कितने कारगर हो सकते हैं।
सिटी इकोनॉमिक रीजन से कस्बों को मिलेगी नई ताकत
बजट में टियर-2 और टियर-3 शहरों को सिटी इकोनॉमिक रीजन (सीईआर) के रूप में विकसित करने की बड़ी घोषणा की गई है। हर ऐसे क्षेत्र को पांच साल में 5,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। यह योजना मुख्यमंत्री योगी की ‘विकसित टाउन’ सोच का विस्तार है। सदियों से भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे कस्बे फिर मजबूत होंगे। इन कस्बों के मजबूत होने से आसपास के गांवों के किसान, कारीगर और छोटे व्यापारी सीधे फायदा उठाएंगे। स्थानीय उत्पादों को बड़ा बाजार मिलेगा और ये कस्बे बड़े शहरों के लिए फुलफिलमेंट सेंटर बनेंगे। इससे अर्थव्यवस्था की मध्य कड़ी मजबूत होगी और विकास का लाभ आखिरी आदमी तक पहुंचेगा। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा कस्बे और छोटे शहरी क्षेत्र हैं, इसलिए इस योजना से यूपी को सबसे ज्यादा लाभ मिलने की उम्मीद है।
‘टेम्पल सिटी’ शब्द का बजट में आना ऐतिहासिक कदम
बजट भाषण में पहली बार ‘टेम्पल सिटी’ शब्द का इस्तेमाल हुआ, जो एक ऐतिहासिक संकेत है। सदियों से भारत में मंदिर वाले नगर अर्थव्यवस्था के मुख्य केंद्र रहे हैं। धार्मिक पर्यटन यहां यात्रा के साथ व्यापार, संस्कृति का आदान-प्रदान और सामाजिक जुड़ाव लाता रहा है। प्रयागराज-काशी-अयोध्या सर्किट से सरकार को साफ संकेत मिला कि अगर देशभर के मंदिर नगरों को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाई जाएं, तो हजारों कस्बों और छोटे शहरों का समग्र विकास हो सकता है। टेम्पल टूरिज्म अब सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का बड़ा साधन बन गया है।
सनातन अर्थशास्त्र से उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा फायदा
बजट में सनातन अर्थशास्त्र की दिशा में उठाए गए कदमों से उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा लाभान्वित होगा। मथुरा, काशी, अयोध्या, प्रयागराज, नैमिषारण्य, गोरखनाथ, हस्तिनापुर, सारनाथ और कुशीनगर जैसे सनातन और बौद्ध परंपरा के प्रमुख केंद्र यूपी में ही हैं। इन जगहों पर पर्यटन, सेवा क्षेत्र, स्थानीय उत्पाद और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से राज्य की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक मजबूती मिलेगी। महाकुंभ, काशी और अयोध्या से मिली सीख अब पूरे देश के लिए नया विकास मॉडल बन रही है।
इनलैंड वाटरवेज से नदी आधारित अर्थव्यवस्था को नई जान
बजट में वाराणसी से पटना के बीच इनलैंड वाटरवेज को और विकसित करने की घोषणा की गई है। साथ ही वाराणसी और पटना में जहाज मरम्मत सेंटर बनेंगे। यह कदम नदी आधारित अर्थव्यवस्था को फिर से जीवंत करेगा। गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती जैसी कई नदियों का सबसे बड़ा नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है। इससे राज्य सड़क, रेल और हवाई मार्ग के साथ-साथ जल मार्ग में भी आगे रहेगा। लॉजिस्टिक्स सस्ती और तेज होगी, जिससे व्यापार बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट 2026-27 महाकुंभ की सीख से प्रेरित है। आस्था आधारित अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा में लाने की यह पहल भारत को नई दिशा दे रही है। उत्तर प्रदेश इस नए विकास मॉडल का केंद्र बन सकता है, जहां सनातन अर्थशास्त्र, कस्बा आधारित विकास और टेम्पल टूरिज्म मिलकर देश की प्रगति को नई रफ्तार देंगे।

