लखनऊ, 16 फरवरी। योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पुराने ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की जर्जर हालत को देखते हुए ‘उत्तर प्रदेश शहरी पुनर्विकास नीति-2026’ लागू कर दी है। इस नीति के तहत 25 साल या उससे ज्यादा पुराने भवनों और अपार्टमेंट्स को सुरक्षित, आधुनिक और बेहतर सुविधाओं वाले रूप में दोबारा विकसित किया जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद शहरी विकास एवं नियोजन विभाग ने शासनादेश जारी कर दिया है। इससे लोगों को सुरक्षित घर मिलेंगे, शहरों का नक्शा बदलेगा और निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में नौकरियां भी बढ़ेंगी।
पुरानी इमारतों की समस्या और नीति का उद्देश्य
उत्तर प्रदेश के कई बड़े शहरों में 25 साल से ज्यादा पुराने अपार्टमेंट और ग्रुप हाउसिंग सोसायटियां अब काफी कमजोर हो चुकी हैं। इनमें रहना जोखिम भरा हो गया है और महंगी शहरी जमीन का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पा रहा। योगी सरकार की इस नई नीति का मुख्य मकसद ऐसे पुराने प्रोजेक्ट्स को नया जीवन देना है, ताकि शहर ज्यादा सुरक्षित, व्यवस्थित और भविष्य के लिए तैयार हो सकें।
कौन-कौन से प्रोजेक्ट्स पात्र हैं?
नीति के अनुसार, कम से कम 25 साल पुराने सभी सार्वजनिक और निजी प्रोजेक्ट्स पुनर्विकास के लिए योग्य होंगे। अगर स्ट्रक्चरल ऑडिट में कोई भवन असुरक्षित पाया जाता है, तो वह भी शामिल हो सकता है। हाउसिंग सोसायटी या अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन में पुनर्विकास शुरू करने के लिए दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी होगी। हालांकि, 1,500 वर्गमीटर से कम वाली जमीन, सिंगल घर, नजूल भूमि, लीज पर दी गई जमीन और इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की जमीन इस नीति के दायरे में नहीं आएंगी।
पुनर्विकास के तीन मॉडल
सरकार ने पुनर्विकास के लिए तीन तरीके तय किए हैं:
- शासकीय एजेंसी खुद काम कराएगी।
- पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत निजी डेवलपर की भागीदारी होगी।
- सोसायटी या एसोसिएशन खुद पुनर्विकास करेगी।
PPP मॉडल में सरकार, डेवलपर और सोसायटी के बीच तीनों की जिम्मेदारियां साफ लिखी होंगी। हर प्रोजेक्ट के लिए डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) बनाना जरूरी होगा, जिसमें नए फ्लैट्स का क्षेत्र, पार्किंग, कॉमन एरिया, ट्रांजिट घर या किराए की व्यवस्था, पैसा कैसे आएगा और काम कितने समय में पूरा होगा – सब कुछ शामिल होगा।
निवासियों की सुविधा और समयसीमा
पुनर्विकास के दौरान जिन लोगों को अस्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट करना पड़ेगा, उन्हें वैकल्पिक आवास या किराया दिया जाएगा। ज्यादातर प्रोजेक्ट्स को तीन साल में पूरा करना होगा। खास मामलों में दो साल तक अतिरिक्त समय मिल सकता है। नियोजन के नियमों में कुछ लचीलापन रखा गया है, ताकि बोर्ड की मंजूरी से केस-टू-केस आधार पर ढील दी जा सके। साथ ही, कई जुड़े भूखंडों को मिलाकर पुनर्विकास की इजाजत है, जिससे बेहतर प्लानिंग हो सकेगी।
फायदे क्या होंगे?
इस नीति से पुराने भवनों को नया रूप मिलेगा, शहरों में बेहतर आवास मिलेंगे और निर्माण, रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए मौके पैदा होंगे। यह उत्तर प्रदेश के शहरों को ज्यादा आधुनिक और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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