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Thursday, March 5, 2026

घुंघरुओं की जादुई अनुगूंज: कथक नृत्यांगना शिवानी मिश्रा की प्रेरक कहानी

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प्रयागराज। प्रयागराज की मूल निवासी और वर्तमान में वाराणसी में सक्रिय कथक नृत्यांगना शिवानी मिश्रा अपनी घुंघरुओं की अनुगूंज से मंच सजाने वाली प्रतिभाशाली कलाकार हैं। सात साल की उम्र से कथक की साधना शुरू करने वाली शिवानी ने अपनी मेहनत, अनुशासन और समर्पण से न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बनाई है। वह कथक को सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा मानती हैं।

शिवानी मिश्रा की शुरुआत और शिक्षा

प्रयागराज की पावन भूमि पर जन्मी शिवानी मिश्रा ने बचपन से ही कथक सीखना शुरू किया। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित गुरुओं के मार्गदर्शन में अपनी कला को निखारा। प्रयाग संगीत समिति से प्रभाकर की उपाधि हासिल करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से कथक में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की। उनकी शिक्षा और निरंतर अभ्यास ने उन्हें एक मजबूत आधार दिया, जिसके बल पर वह आज एक कुशल नृत्यांगना और कोरियोग्राफर के रूप में जानी जाती हैं।

प्रदर्शन और कोरियोग्राफी में योगदान

शिवानी मिश्रा ने देश के कई बड़े मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। ताज महोत्सव, बलिया महोत्सव (जैसे ददरी मेला) और अन्य सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी कोरियोग्राफी और समूह नृत्य की प्रस्तुतियां दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर चुकी हैं। हाल ही में वाराणसी के नामो घाट पर आयोजित कार्यक्रम में उनकी कथक प्रस्तुति ने उत्तर-दक्षिण सांस्कृतिक एकता को प्रदर्शित किया। उन्होंने बड़े समूहों (जैसे 150 कलाकारों) के साथ समन्वय कर सफलतापूर्वक शो निर्देशित किए हैं। उनके कार्य ने उन्हें कई युवा सम्मानों से नवाजा है।

शिवोहम संस्था और सामाजिक योगदान

भगवान शिव की भक्त शिवानी ने “शिवोहम” नामक संस्था की स्थापना की है। इस संस्था के माध्यम से वह कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता को जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। शिवोहम ग्रुप के तहत वह युवा कलाकारों को मंच देने, उन्हें प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। उनकी यह पहल कथक जैसी शास्त्रीय कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

कथक के प्रति उनका नजरिया

शिवानी मिश्रा कहती हैं, “कथक सिर्फ नृत्य नहीं, यह हमारी परंपरा की चलती-फिरती कहानी है। जब घुंघरू बजते हैं और कदम ताल पर चलते हैं, तो इतिहास और भावनाएं मंच पर जीवित हो उठती हैं।” उनकी साधना और सृजनात्मकता उन्हें भारतीय कथक परंपरा की उभरती हुई हस्तियों में शामिल कर रही है।

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