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Wednesday, January 26, 2022
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बंगाल की घटनायें लोकतंत्र पर आघात, है आपातकाल का आभाश

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—देश विरोधी प्रोपेगैंडा करने वालों को बेनकाब करें आपातकाल योद्धा
—इस विषय में जनजागरण करने का संकल्प लें, देश और समय की जरूरत

Indradev shukla

(कैलाश सोनी/राज्यसभा सदस्य)

जहां एक ओर कोविड-19 वायरस वैश्विक महामारी के कारण हमारा देश संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है, वहीं दूसरी ओर बंगाल हिंसा के कारण लोकतंत्र पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं, आपातकाल समर्थकों के द्वारा कोरोना वायरस की रोकथाम के लिये वैक्सीन के विरूद्ध प्रोपेगैंडा ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है, लेकिन संतोष की बात है कि देष इस समय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एकजुट है, ऐसे में आपातकाल योद्धाओं का कर्तव्य है कि वे देश विरोधी प्रोपेगैंडा करने वालों को बेनकाब कर इस विषय में जनजागरण करने का संकल्प लें, यह देश और समय की आवष्यकता है। हम भारतवासी सदैव से ही स्वतंत्रता के प्रेमी और उपासक हैं, इसलिये जब-जब भी हमारी स्वाधीनता को अपह्रत करने के प्रयत्न हुए, हमने उसका प्रतिकार किया है, अनेकबार विदेषी शक्तियों ने हमें पराधीन बनाने की कोशिश की, किन्तु हमारे पूर्वजों ने उनके विरूद्ध सतत संघर्ष किया और अंततः विजयी हुए।

Indradev shukla

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लोकतंत्र का आधार समाज हित में सभी के रचनात्मक विचारों का सम्मान एवं उनका समावेश है। राजनीति मानव के सभी कार्य व्यापार का विज्ञान है। केवल हम ही श्रेष्ठ हैं, हमें ही व्यवस्था संचालन का अधिकार है। यही हमें तानाशाही की ओर प्रवृत्त करता है। मतभिन्नता ही लोकशाही का मूल आधार है। मतभिन्नता के आधार पर हत्या का उपक्रम आतंकवाद पर ठहरता है। हिंसा का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, न इसकी भारतीय संविधान में कोई अनुमति है।
स्वतंत्रता की महिमा से मंडित हमारे देश के लोकतांत्रिक इतिहास में हमारी आजादी के हरण का एक काला अध्याय दर्ज है, किन्तु उसके साथ ही दूसरी आजादी की हमारी संघर्ष गाथा भी जुड़ी है।

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वह हमारे आजादी से जीने के संस्कार का एक ज्वलित उदाहरण है। परंतु वर्तमान की नई पीढ़ी को लोकतंत्र पर आयी इस अमावस्या की शायद ही कोई जानकारी होगी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में 25 जून 1975 में एक ऐंसा भी अवसर आया, जब एक सत्तासीन व्यक्ति ने जिनका उनके भ्रष्टाचार के कारण चुनाव परिणाम इलाहाबाद हाईकोर्ट से रद्द कर दिया गया, अपनी सत्ता पिपासा को पूरा करने के लिये देशवासियों के सारे लोकतांत्रिक अधिकारों को तथा सारी संवैधानिक मर्यादाओं को समाप्त कर संपूर्ण देश को आपातकाल की बेड़ी में जकड़ दिया। आपातकाल लगाने के लिये आवश्यक सारे संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करके यह घोषणा की गई थी। प्रावधानों के तहत आधे से अधिक प्रांत जब मांग करें नोट भेंजे कि कानून व्यवस्था संकट में है और केन्द्रीय केबिनेट सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करें, तब आपातकाल लगता है।

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कोई अपील नहीं, कोई न्यायिक व्यवस्था नहीं, न्यायालयों के सारे अधिकार समाप्त कर दिये गये और लाखों निरापराध लोगों की धड़ाधड़ गिरफतारी हुई तथा लोकनायक जयप्रकाष नारायण सहित सभी विरोधी दलों के नेता जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडीस कांग्रेस के कुछ नेता 250 से अधिक पत्रकार जेलों में डाल दिये गये। निरापराध नागरिकों के साथ हिंसा का ऐंसा तांडव देश ने पहले कभी नहीं देखा था। न्यायपालिका समाप्त कर दी गई, सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों को सुपर सीड करके अपने चुनाव को वैध करा लिया गया, संपूर्ण देश में हाहाकार, जेल के भीतर भी अकेले मध्यप्रदेश में 100 से अधिक लोकतंत्र सेनानियों की असमय मृत्यु हुई। 1,10,806 राजनैतिक और सामाजिक नागरिकों को मीसा/डीआईआर ने बिना मुकदमा चलाये जेलों में निरूद्ध किया गया, द.प्र.सं. की धारा 151 की संख्या कई लाखों में जिसकी गणना नहीं विश्वास रखने वाले सभी के लिये आवश्यक है, नई पीढ़ी को भी इसे जानने की जरूरत है जिसकी प्रेरणा से भविष्य में लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखा जा सके।

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देश हित में यह बहुत आवष्यक है, ताकि अभिव्यक्ति की आजादी फिर कभी बाधित न हो पाये। लोकतंत्र पर आघात की कोई हिम्मत न कर सके।
25 एवं 26 जून 2006 को करेली में दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसमें मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़ के कुछ लोकतंत्र सेनानी शामिल हुये, तब लोकतंत्र सेनानी संघ को एक राज्य स्तरीय संगठन बना लिया गया था। 26 जून 2015 को भोपाल में आयोजित सम्मेलन में इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया। आज इस संगठन का परिपूर्ण आकार सभी के सामने है वह इसके केन्द्रीय पदाधिकारियों के निरंतर प्रवास और प्रयास का परिणाम है। आज कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक के लोकतंत्र सेनानी संगठन हो चुके हैं। लगभग सभी वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आ चुके इन सेनानियों के उत्साह में आज ही कोई कमी नहीं आई है। देशहित में कुछ भी कर गुजरने को आज भी ये सभी तत्पर हैं, इसलिये संपर्क होते ही हर प्रांत में प्रांतीय संगठन खड़ा हो गया, जिनके प्रांतीय सम्मेलन भी आयोजित हो रहे हैं।

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इन सेनानियों के त्याग और तपस्या को सम्मानित करने का अर्थ अपने गौरवशाली इतिहास को सम्मानित करना है, जो लोग इतिहास को भुलाने के लिये आमादा थे उन्हें आज संपूर्ण देश नकार चुका है जिन्होने इसके महत्व को समझा, ऐंसे कई प्रांत के मुख्यमंत्रीगण लोकतंत्र सेनानियों को मान-धन सहित चिकित्सा, यातायात आदि की सुविधा मुहैया करके लोकतंत्र के प्रति अपने श्रद्धाभाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं पिछले 2 वर्षों में हमारे संगठन के प्रयास और संबंधित सरकारों के समर्थन से जिन प्रांतों में यह योजना पहली बार लागू हुई है, असम, उड़ीसा और कर्नाटक में इसे लागू करने के लिये आश्वासन मिल चुका है, आवश्यक प्रक्रिया से गुजरने के बाद घोषणा होने की संभावना है।
जहां एक ओर राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र इन तीनों राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता में आते ही सबसे पहला हमला लोकतंत्र सेनानियों पर बोला, वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही समस्त सम्मान बहाल कर दिया, यह फर्क है कांगे्रस और भाजपा की राज्य सराकारों में मुख्यमंत्री को साधुवाद।

बंगाल में सरकार के इशारे पर 208 लोकतंत्र सेनानी राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या

बंगाल में सत्तारूढ़ दल के इशारे पर सुनियोजित तरीके से 208 लोकतंत्र सेनानी राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है, 107 महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ दुष्कर्म और 22000 कार्यकर्ताओं के मकान जला दिये गये हैं। बंगाल में हिंसा का नंगा नाच हो रहा है। इसलिये विनम्र प्रार्थना है कि बंगाल हिंसा की जांच कराने हेतु सर्वोच्च न्यायालय स्वयमेव संज्ञान ले तथा केन्द्र सरकार के द्वारा बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाकर लोकतंत्र के रक्षण की पहल समयोचित होगा।
आपातकाल की समाप्ति के पश्चात आई तत्कालीन केन्द्र सरकार ने यह अनुभव किया था कि यह देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम है जिसने देश के लोकतंत्र को उसकी बेड़ियां तोड़कर कारागार से मुुक्त किया। इस गौरवषाली संघर्ष की महिमा को भावी पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने की उनकी मंशा जरूर रही होगी, क्योंकि वे स्वयं इसके सेनापति व मार्गदर्शक थे। परंतु दुर्भाग्य से वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये। आज इतने वर्षों के बाद उसी संघर्ष से निकले लोकतंत्र सेनानी अच्छी संख्या में केन्द्र में सत्तासीन हैं।

नई पीढ़ी से इस इतिहास को छुपाकर रखा गया
स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला महासंग्राम था जिसमें संपूर्ण देश ने अपनी भूमिका निभाई, परंतु कैसा दुर्भाग्य, नई पीढ़ी से इस इतिहास को छुपाकर रखा गया। इस संघर्ष गाथा को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवष्यकता से हमने सरकार को दृढ़ता पूर्वक अवगत कराया है। हमें विश्वास है कि शीघ्र ही बच्चों को इसकी जानकारी उपलब्ध हो जायेगी। तत्कालीन केन्द्र सरकार ने ही लोकतंत्र को कलंकित किया था, अतः आज की केन्द्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि लोकतंत्र पर लगे उस कलंक को मिटाने वाले लोकतंत्र सेनानियों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देकर इतिहास के साथ इस निमित्त हमे सरकार के प्रभावषाली मंत्रियों का समर्थन मिल रहा है। इसे निर्णायक स्तर तक पहुंचाने के लिये संगठन की ओर से निरंतर प्रयास जारी है। यह सब किया जाना इसलिये भी आवश्यक है कि जिसमें इस संग्राम से वर्तमान तथा आगे आनेवाली पीढ़ियां स्वाधीन जीने के लिये कोई भी मूल्य चुकाने की सतत प्रेरणा ग्रहण कर सकें और दूसरी ओर शासन-प्रशासन में बैठे लोगों की शक्ति और सामथ्र्य का भी विस्मरण न हो।

इतिहास को महत्व दें और उन इतिहास पुरूषों को सम्मानित करें

हम तो केन्द्र सरकार से बस इतना निवदेन कर सकते हैं कि जिस संघर्ष के कारण लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ, उस सीढ़ी को, उस इतिहास को महत्व दें और उन इतिहास पुरूषों को सम्मानित करें। पिछले 44 साल में हम लगभग सत्तर हजार लोकतंत्र सेनानियों को हम खो चुके हैं। रोज देषभर से जिस प्रकार के शोक समाचार मिल रहे हैं, उससे लगता है कि अगले दस साल में इनकी प्रजाति विलुप्ति की कगार तक पहुंच जाएगी। अतः ऐंसे महत्वपूर्ण निर्णय को और अधिक टाला नहीं जाना चाहिये । इन लोकतंत्र के मानकों से प्रेरित होकर देष ठीक दिषा में चल सके।

बंगाल में लोकतंत्र समाप्त, अभिव्यक्ति की आजादी तार-तार

लोकतंत्र के लिये आज भी चुनौतियां कम नहीं हुई है, बंगाल इसका उदाहरण है जहां लोकतंत्र समाप्त है, अभिव्यक्ति की आजादी तार-तार हुई है, आपातकाल की 46 वी वर्षी पर हम बंगाल में हुये हिंसावाद को आपातकाल की पुनरावृत्ति मानते हैं, ऐंसे कृत्यों को धिक्कारते हैं सरकार संज्ञान में लेकर ऐंसी सरकार को बर्खास्त करे। उच्चतम न्यायालय बंगाल की घटनाओं को स्वतः संज्ञान में लेकर आदेशित करे। आपातकाल लगाने वालों की मानसिकता में अभी कोई बदलाव नहीं आया है, पिछले वर्ष मुख्य न्यायाधिपति के विरूद्ध महाभियोग लाना फिर वापिस लेना। सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के विरूद्ध अनास्था रखना और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी इनका दृष्टिकोण जिस तरह से कोविड की आपदा में जो रोल रहा है, इससे देष को सतर्क करने की जरूरत है, हम सब अपने जीवन की शेष उर्जा को समाज को सही दिषा देने एवं राष्ट्र को रचनात्मक एवं सकारात्मक चेतना से भरने का कार्य करने में और ताकत से जुटें।

(कैलाश सोनी)
राज्यसभा सदस्य
राष्ट्रीय अध्यक्ष
लोकतंत्र सेनानी संघ

(लेखक- लोकतंत्र सेनानियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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