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Saturday, February 21, 2026

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026: हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति ने कहा- दस्तावेजीकरण से बचाएं मातृभाषाएं

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वर्धा/खुशबू पांडेय। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर 21 फरवरी 2026 को एक संवाद संगोष्ठी आयोजित की गई। कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि कई मातृभाषाएं इस्तेमाल कम होने से खत्म होने की कगार पर हैं, इसलिए इनका ठीक से दस्तावेजीकरण करके बचाना बहुत जरूरी है। कार्यक्रम का मुख्य विषय था—‘बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की राय’।

मातृभाषाओं के संरक्षण की जरूरत पर जोर

कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने अपनी बात में कहा कि मातृभाषा सिर्फ बोलचाल का जरिया नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति से जुड़ी हुई है। उन्होंने सभी से अपील की कि अपनी-अपनी मातृभाषा का सम्मान करें, उसे बढ़ावा दें और संरक्षण के लिए संकल्प लें। उन्होंने जोर दिया कि भाषाई स्वाभिमान बढ़ाना और स्थानीय भाषाओं को सीखना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। कई भाषाएं विलुप्ति की ओर हैं, ऐसे में उनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण समय की मांग है।

मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के विचार

कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रोफेसर सुधीर प्रताप सिंह मुख्य अतिथि थे। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में मातृभाषा को मिले महत्व का जिक्र किया। उनका कहना था कि बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने का मकसद संस्कृति को बचाना है। भाषा बचाने के लिए आंदोलन से ज्यादा जरूरी है उस भाषा में रचनात्मक काम करना, यानी साहित्य, कहानियां, कविताएं लिखना।

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026: हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति ने कहा- दस्तावेजीकरण से बचाएं मातृभाषाएं
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026: हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति ने कहा- दस्तावेजीकरण से बचाएं मातृभाषाएं

विशिष्ट अतिथि बैंक ऑफ इंडिया के विदर्भ आंचलिक प्रबंधक डॉ. कुश गणहोत्रा ने कहा कि अलग-अलग भाषाएं सीखने से व्यक्ति का दिमागी विकास अच्छा होता है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि रोजमर्रा की जिंदगी में आचार-विचार और व्यवहार में मातृभाषा का ज्यादा इस्तेमाल करें।

विभिन्न भाषाओं में विचार-विमर्श

संगोष्ठी में कई भाषाओं के जानकारों ने अपनी मातृभाषा में ही अपने विचार रखे। इसमें डॉ. रामानुज अस्थाना ने अवधी में, डॉ. अमित राय ने बुंदेली में, हिमांशु शेखर ने उर्दू में, डॉ. अनिर्बान घोष ने बंगाली में, डॉ. ज्योतिष पायेंड़ ने असमी में, डॉ. मैत्रेयी ने भोजपुरी में, डॉ. कृष्ण चंद्र पांडेय ने हिंदी में, डॉ. विजया सिंह ने मगही में, डॉ. तेजस्वी एच.आर. ने कन्नड़ में, डॉ. कोमल कुमार परदेशी ने मराठी में, डॉ. जगदीश नारायण तिवारी ने संस्कृत में, डॉ. प्रदीप ने हरियाणवी में, डॉ. नरेंद्र कुमार पाल ने गुजराती में, डॉ. हरप्रीत कौर ने पंजाबी में, शोधार्थी धरित्री स्वाई ने उड़िया में और शोधार्थी खुशाल सिंह ने राजस्थानी में अपनी राय दी।

कार्यक्रम का संचालन और समापन

भाषा विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. अवधेश कुमार ने विषय प्रवर्तन किया और संगोष्ठी की शुरुआत की। भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. एच. ए. हुनगुंद सह-संयोजक थे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती माता के चित्र पर पुष्पार्पण और कुलगीत से हुई। संचालन अनुवाद अध्ययन विभाग के डॉ. आर.पी. यादव ने किया और आभार डॉ. हुनगुंद ने माना। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

इस मौके पर बड़ी संख्या में अध्यापक, शोधार्थी और छात्र मौजूद रहे। यह संगोष्ठी मातृभाषाओं के महत्व को समझने और उन्हें बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।

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