प्रयागराज/खुशबू पांडेय। योग शास्त्रों में मानव शरीर के मेरुदंड और मस्तिष्क में सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों का वर्णन मिलता है। इन केंद्रों को चक्र कहा जाता है। स्वामी योगमाता के अनुसार, ये केंद्र चेतना को नीचे से ऊपर की ओर ले जाने में मदद करते हैं। साधना के माध्यम से व्यक्ति अपनी चेतना को विकसित कर सकता है और आध्यात्मिक जागरण की ओर बढ़ सकता है। यह प्रक्रिया मानवीय सीमाओं से आगे बढ़कर व्यापक अनुभव की ओर ले जाती है।
सात चक्र क्या हैं?
भारतीय योग परंपरा के अनुसार, मानव शरीर में सात मुख्य चक्र होते हैं। ये मेरुदंड के साथ जुड़े सूक्ष्म केंद्र हैं, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं:
- मूलाधार चक्र: शरीर के आधार में स्थित, स्थिरता और सुरक्षा से जुड़ा।
- स्वाधिष्ठान चक्र: जननेंद्रिय क्षेत्र के पास, भावनाओं और रचनात्मकता से संबंधित।
- मणिपुर चक्र: नाभि क्षेत्र में, व्यक्तिगत शक्ति और आत्मविश्वास का केंद्र।
- अनाहत चक्र: हृदय क्षेत्र में, प्रेम और करुणा से जुड़ा।
- विशुद्धि चक्र: गले में, संचार और अभिव्यक्ति का केंद्र।
- आज्ञा चक्र: भौंहों के बीच, अंतर्दृष्टि और ज्ञान से संबंधित।
- सहस्रार चक्र: सिर के ऊपरी भाग में, आध्यात्मिक जागरण और ब्रह्मांड से जुड़ाव का प्रतीक।
ये चक्र कमल के फूल की तरह वर्णित किए गए हैं। साधना से इनकी पंखुड़ियां खुलती हैं और ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

चेतना की यात्रा कैसे होती है?
जब साधक जागरूकता के साथ इन चक्रों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो चेतना क्रमिक रूप से ऊपर उठती है। योग अभ्यास, ध्यान और प्राणायाम से इन केंद्रों को संतुलित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया माया से ब्रह्म की ओर, द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती है। कई लोग नियमित अभ्यास से शांति, संतुलन और स्पष्टता का अनुभव करते हैं।
स्वामी योगमाता कहती हैं कि ये केंद्र आत्मा के अवतरण और ऊर्ध्वगमन के द्वार हैं। हालांकि, यह व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है और वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह सिद्ध नहीं है। योग प्रैक्टिशनर इसे आंतरिक विकास का साधन मानते हैं।
चक्र जागरण के लिए सरल सुझाव
नियमित योगासन, सांस की एक्सरसाइज और ध्यान से चक्रों का संतुलन बनाया जा सकता है। शुरुआत में किसी अनुभवी गुरु की देखरेख में अभ्यास करना बेहतर होता है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति दोनों में सुधार हो सकता है।
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