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Saturday, February 21, 2026

दिल्ली शब्दोत्सव 2026: लेखिका अमी गणत्रा ने कहा, रामराज्य के लिए श्रीराम जैसे बनना जरूरी

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नई दिल्ली में मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में चल रहे दिल्ली शब्दोत्सव 2026 के दूसरे दिन हिंदू इतिहास पर चर्चा हुई। इस सत्र में लेखिका अमी गणत्रा ने भगवान राम पर अपने विचार रखे और कहा कि अगर समाज को रामराज्य की ओर ले जाना है तो श्रीराम जैसे बनना पड़ेगा। वहीं, आरएसएस के दिल्ली प्रदेश महासचिव अनिल गुप्ता ने युवाओं की धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़ती रुचि की तारीफ की। यह तीन दिवसीय आयोजन भारतीय संस्कृति और साहित्य को समर्पित है।

हिंदू इतिहास सत्र में अमी गणत्रा के विचार

दिल्ली शब्दोत्सव 2026 के हिंदू इतिहास सत्र में लेखिका अमी गणत्रा ने भगवान राम को लेकर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि श्रीराम के अस्तित्व का कोई सबूत मांगने की जरूरत नहीं है। श्रीराम हमारे लिए इतिहास पुरुष हैं, जो हमेशा से हमारे साथ जीवंत हैं। उन्होंने समाज के लिए मूल्यों की स्थापना की है।

अमी गणत्रा ने आगे कहा, “अगर समाज को रामराज्य की ओर ले जाना है तो उसके लिए श्रीराम जैसे बनना पड़ेगा। मुझे नहीं लगता कि देश की आजादी तक किसी ने श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाया था। जो सवाल उठे, वे सिर्फ राजनीति की वजह से हुए। अदालतों में भगवान राम के होने के सबूत मांगे गए। यह हिंदुओं की सहनशीलता है कि उन्होंने सबूत दिए और अदालत को भी मानना पड़ा।”

उनके इन विचारों से साफ है कि श्रीराम न सिर्फ धार्मिक बल्कि सामाजिक मूल्यों के प्रतीक हैं।

युवाओं में संस्कृति और धर्म की बढ़ती रुचि: अनिल गुप्ता

आरएसएस के दिल्ली प्रदेश महासचिव अनिल गुप्ता ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि पहले धर्म और संस्कृति को समझाना मुश्किल था, लेकिन अब यह बहुत आसान हो गया है। आज की जनरेशन जी यानी युवा पीढ़ी के लिए भी यह सरल है। देश के युवा अब धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

उन्होंने उदाहरण दिया कि पहले भजन गायक ज्यादातर 40-50 साल के होते थे, लेकिन अब 20-25 साल के युवा भजन गा रहे हैं। अनिल गुप्ता ने कहा, “आज की युवा पीढ़ी कमाल कर रही है। उन्हें भजन और धर्म का महत्व अच्छे से समझ आ रहा है।”

यह बदलाव भारतीय संस्कृति के प्रति युवाओं के जुड़ाव को दिखाता है।

दिल्ली शब्दोत्सव 2026 जैसे आयोजन संस्कृति, साहित्य और इतिहास को जीवंत रखने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और समाज में सकारात्मक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं।

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