नई दिल्ली में चल रहे दिल्ली शब्दोत्सव 2026 के दूसरे दिन अयोध्या के हनुमत निवास पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने भारतीय इतिहास और हिंदू अस्मिता पर महत्वपूर्ण बातें कही। उन्होंने कहा कि हिंदुओं को अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए और ज्यादा तैयार रहना चाहिए। साथ ही, यह दावा कि भारत का इतिहास कभी लिखा ही नहीं गया, पूरी तरह गलत और दुष्प्रचार है।
आचार्य ने बताया कि “इतिहास” शब्द खुद भारत की प्राचीन सभ्यता से दुनिया को मिला है और भारतीय इतिहास वेदों जितना पुराना है। इस तीन दिवसीय साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्सव में ऐसे विचारों ने लोगों का ध्यान खींचा।
शब्दोत्सव 2026 की सराहना और हिंदू अस्मिता पर जोर
आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने दिल्ली शब्दोत्सव 2026 की तारीफ की। यह कार्यक्रम दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन के सहयोग से मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में 2 से 4 जनवरी तक चल रहा है। उन्होंने कहा कि शब्दों के जरिए ही हमारी परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। इस उत्सव में हिंदू इतिहास यानी भारत की सनातन परंपरा और मूल्यों पर चर्चा हो रही है, जो बहुत जरूरी है।
आचार्य ने आगे कहा कि दुनिया में कई उदाहरण हैं जहां लोग अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हिंदुओं को भी अपनी पहचान और अस्तित्व की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। भविष्य में क्या चुनौतियां आ सकती हैं, इसके लिए रणनीति बनानी होगी। जो लोग अपने अस्तित्व को लेकर सजग नहीं रहते, उनके सामने मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
भारतीय इतिहास पर विचारोत्तेजक चर्चा
उत्सव के सत्र में सवाल उठा कि क्या भारत का इतिहास कभी लिखा ही नहीं गया? आचार्य ने इसे साफ झूठ बताया। उन्होंने कहा कि यह बात बार-बार दोहराई जा रही है ताकि इसे सच मान लिया जाए, लेकिन यह दुष्प्रचार है। “इतिहास” शब्द खुद भारत ने दुनिया को दिया है। भारत में इतिहास की परंपरा वेदों जितनी पुरानी है।
वेद विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और पूरी दुनिया ने ऋग्वेद की प्राचीनता को मान लिया है। उपनिषद काल से ही “इतिहास” शब्द का प्रयोग मिलता है। भारतीय इतिहास का मुख्य तत्व “शांत रस” है। रामायण और भगवद्गीता जैसे ग्रंथों में भी यही भाव दिखता है। पुरातात्विक साक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं।
आचार्य ने कहा कि भारत में इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। यह समाज का हिस्सा है। यहां बेटे का विवाह तक परिवार के इतिहास के बिना मुश्किल माना जाता है। वेद पढ़ने की परंपरा भी इतिहास से जुड़ी हुई है। प्राचीनता को समझने के लिए आधुनिक सोच को भी परिपक्व होना पड़ेगा।
वेदों को काल्पनिक कहने पर प्रतिक्रिया
कुछ लोग वेदों को काल्पनिक या मिथक बताते हैं। आचार्य ने इसे गलत ठहराया। उन्होंने कहा कि हर रचना पहले कल्पना से शुरू होती है और फिर हकीकत बनती है। “कल्प” खुद वेद का एक अंग है। महर्षियों की कल्पना वैज्ञानिक और व्यवस्थित थी।
आज तक कोई वैज्ञानिक वेदों के सिद्धांतों को गलत साबित नहीं कर पाया है। जब विज्ञान उन्हें झूठा नहीं ठहरा सका, तो उन्हें सिर्फ कल्पना कहना ठीक नहीं। यह सिर्फ दुष्प्रचार है।
दिल्ली शब्दोत्सव 2026 जैसे आयोजन भारतीय संस्कृति और इतिहास को समझने में मदद करते हैं। आचार्य के विचारों से साफ है कि हमारी विरासत बहुत समृद्ध है और इसे संभाल कर रखना हमारी जिम्मेदारी है।
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