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2029 में पूरे देश में एक साथ होंगे लोकसभा और विधानसभा चुनाव! जानें क्या होंगे संवैधानिक और कानूनी बदलाव

वन नेशन-वन इलेक्शन (One Nation One Election) पर जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने लखनऊ में बड़ा ब(यान दिया है। जानें 2029 में होने वाले एक साथ चुनाव की तैयारी, आवश्यक संवैधानिक बदलाव और इसके फायदे।

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One Nation One Election: भारत में चुनावी सुधारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम उठाने की तैयारी तेज हो गई है। केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2029 में पूरे देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराए जाएं। इस दिशा में काम कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JCP) के अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया है कि इसके लिए आवश्यक संवैधानिक और कानूनी संशोधन किए जाएंगे।

लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ‘एक देश-एक चुनाव’ (One Nation-One Election) किसी राजनीतिक दल का निजी एजेंडा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रहित से जुड़ा एक व्यापक चुनावी सुधार है। इससे न केवल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि देश के शासन को भी एक नई दिशा मिलेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से देश में इस अवधारणा को लागू करने की वकालत करते रहे हैं। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण देश के विकास कार्यों पर ब्रेक लग जाता है, प्रशासनिक काम अटक जाते हैं और सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। लगातार चुनाव होने से आदर्श आचार संहिता बार-बार लागू करनी पड़ती है, जिससे कई जनकल्याणकारी परियोजनाएं समय पर शुरू नहीं हो पातीं और सरकारी मशीनरी का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा चुनावी ड्यूटी में ही व्यस्त रहता है। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ आयोजित होते हैं, तो समय, संसाधन और देश के पैसों की भारी बचत होगी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1952 से 1967 तक देश में एक साथ हुए थे चुनाव

जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था भारत के लिए कोई नई या अनूठी बात नहीं है। देश आजाद होने के बाद शुरुआती वर्षों में, यानी वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा तथा देश के अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही आयोजित कराए गए थे।

उस समय देश के पास न तो आज जैसी आधुनिक तकनीकें थीं और न ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) जैसी सुविधाएं उपलब्ध थीं। उस दौर में मतदान पूरी तरह से मतपत्रों (बैलेट पेपर) के जरिए होता था, इसके बावजूद चुनाव पूरी तरह सफल और निष्पक्ष रहते थे। बाद के वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता, कुछ राज्यों में समय से पहले विधानसभाएं भंग होने, राष्ट्रपति शासन लागू होने और नए राज्यों के गठन के कारण यह चुनावी चक्र पूरी तरह टूट गया। इसके अलावा, आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाए जाने के कारण भी चुनाव का पूरा कैलेंडर अस्त-व्यस्त हो गया।

भारतीय मतदाताओं की परिपक्वता पर पूरा भरोसा

पीपी चौधरी ने उन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें यह कहा जाता है कि एक साथ चुनाव होने से देश के मतदाता भ्रमित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मतदाता वैचारिक और राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक और परिपक्व हैं। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत ही मतदाताओं की समझ है। अक्सर राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियां चुनाव परिणामों को लेकर जो भी कयास लगाते हैं, वे कई बार गलत साबित होते हैं क्योंकि मतदाता स्वतंत्र रूप से सोच-समझकर अपने मताधिकार का प्रयोग करता है।

जब 1952 से 1967 के बीच करोड़ों मतदाताओं ने बिना किसी भ्रम के एक साथ दोनों चुनावों में हिस्सा लिया था, तो आज के आधुनिक दौर में ऐसा होना और भी आसान है। आज का मतदाता पहले से कहीं अधिक शिक्षित, जागरूक और सूचनाओं से लैस है, इसलिए भ्रमित होने की बातें पूरी तरह निराधार हैं।

लोकतंत्र और संघीय ढांचे को कोई खतरा नहीं

एक देश-एक चुनाव के विरोध में उठने वाले संवैधानिक सवालों का जवाब देते हुए जेपीसी अध्यक्ष ने कहा कि कुछ लोग इसे संघीय ढांचे (Federal Structure) या लोकतंत्र के खिलाफ बताते हैं, जो कि पूरी तरह तर्कहीन है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आजादी के बाद के चार चुनावों में एक साथ चुनाव कराने से देश के संघीय ढांचे या लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई हनन नहीं हुआ था, तो आज ऐसा होने का दावा केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा मात्र है। 1967 के बाद भी कई राज्यों के विधानसभा चुनाव सामान्य रूप से लोकसभा चुनावों के साथ ही होते रहे हैं, इसलिए इस व्यवस्था को लोकतंत्र के खिलाफ बताना ऐतिहासिक और तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है।

कई प्रतिष्ठित आयोगों और समितियों ने की है वकालत

पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया कि यह विचार किसी तात्कालिक सरकार की उपज नहीं है। देश की कई प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं और कानून विशेषज्ञों ने समय-समय पर इस चुनावी सुधार की जोरदार सिफारिश की है:

  • चुनाव आयोग (1983): निर्वाचन आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सबसे पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की जोरदार वकालत की थी।
  • विधि आयोग (1999): लॉ कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में देश के हित में इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया था।
  • संविधान समीक्षा आयोग (2002): संविधान के कामकाज की समीक्षा करने वाले उच्च स्तरीय आयोग ने भी इसे बेहद जरूरी सुधार माना था।
  • संसदीय स्थायी समिति (2015): कांग्रेस के राज्यसभा सांसद की अध्यक्षता वाली कानून और कार्मिक संबंधी स्थायी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इसका खुलकर समर्थन किया था।
  • नीति आयोग (2018): नीति आयोग ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में देश को इस दिशा में आगे बढ़ने की स्पष्ट सलाह दी थी।

पूर्व राष्ट्रपति कोविंद की अध्यक्षता में तैयार हुई 18 हजार पन्नों की रिपोर्ट

इस व्यवस्था को धरातल पर उतारने के लिए केंद्र सरकार ने साल 2020 में देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति (High-Level Committee) का गठन किया था। इस समिति में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राज्यसभा के तत्कालीन सांसद गुलाम नबी आजाद समेत कई विधिक मामलों के विशेषज्ञ और जानकार शामिल थे।

इस समिति ने देश के सभी राजनीतिक दलों, विधिक विशेषज्ञों, संवैधानिक संस्थाओं, चुनाव आयोग और आम जनता से बहुत बारीकी से और व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया। इसके बाद करीब 18,000 पन्नों से अधिक की एक अत्यंत विस्तृत और गहन रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी गई। इस समिति ने न केवल लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की स्पष्ट सिफारिश की, बल्कि त्रिस्तरीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए स्थानीय निकायों (नगर निगम और पंचायतों) के चुनावों को भी एक निश्चित समय सीमा के भीतर कराने का महत्वपूर्ण सुझाव दिया।

संसद से जेपीसी तक का सफर और जमीनी स्तर पर दौरा

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की समिति की सिफारिशों का गहराई से अध्ययन करने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संबंध में आवश्यक विधेयकों को अपनी मंजूरी दी। इसके बाद इन विधेयकों को भारतीय संसद के पटल पर रखा गया। संसद के दोनों सदनों में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इस पर विस्तार से चर्चा की गई और लोकतंत्र की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इस पूरे मामले को ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) के सुपुर्द कर दिया गया ताकि सभी पक्षों से एक बार फिर व्यापक राय मशविरा कर एक संतुलित रिपोर्ट तैयार की जा सके। जेपीसी के अध्यक्ष के नाते पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया कि समिति का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के फायदे या नुकसान को देखना नहीं है, बल्कि देशहित में सर्वोत्तम निर्णय लेना है।

अब तक यह संयुक्त संसदीय समिति देश के लगभग 10 राज्यों का दौरा पूरा कर चुकी है। इन राज्यों में प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और गोवा शामिल हैं। इन दौरों के दौरान जेपीसी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों, पूर्व मुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, कानूनी सलाहकारों और सामाजिक संगठनों से सीधे मुलाकात कर उनके बहुमूल्य सुझाव दर्ज किए हैं। समिति वर्तमान में केवल सभी पक्षों की दलीलें और राय सुन रही है, और सभी प्राप्त सुझावों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ही अपनी अंतिम और निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार करेगी।

बार-बार होने वाले चुनावों से प्रभावित होता है देश का विकास

पीपी चौधरी ने जोर देकर कहा कि समिति के सामने सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्र का हित है। लगातार चुनाव होने से देश के आर्थिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है और विदेशी निवेश का माहौल भी प्रभावित होता है। बार-बार चुनाव ड्यूटी में व्यस्त रहने के कारण देश के लाखों प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक और सुरक्षा बल अपने मूल कर्तव्यों को छोड़कर चुनावी व्यवस्थाओं में उलझे रहते हैं। यदि देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था बहाल हो जाती है, तो इन मानव संसाधनों और सुरक्षा बलों का उपयोग देश की आंतरिक सुरक्षा और बुनियादी विकास कार्यों में अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।

निर्वाचन आयोग 6 महीने में चुनाव कराने में पूरी तरह सक्षम

जब जेपीसी अध्यक्ष से यह पूछा गया कि क्या देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए पर्याप्त ईवीएम (EVM) और आवश्यक तैयारियां मौजूद हैं, तो उन्होंने बेहद सकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आज की तकनीक और बुनियादी ढांचा पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और उन्नत है। यदि देश के मुख्य निर्वाचन आयोग को लगभग छह महीने पहले इसकी तैयारी करने का पर्याप्त समय मिल जाए, तो वह पूरे भारत में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने में पूरी तरह से सक्षम है। संयुक्त संसदीय समिति देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक गरिमा को ध्यान में रखकर ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी, ताकि भविष्य में इस ऐतिहासिक व्यवस्था को पूरे देश में बेहद सुचारू और व्यवहारिक तरीके से लागू किया जा सके।

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