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महिलाओं के खतना पर SC में तीखी बहस, वकील का दावा – महिलाओं के यौन सुख बढ़ाने के लिए है FGM प्रथा

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) यानी महिलाओं के खतना की प्रथा पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता और मानवीय गरिमा के अधीन है।

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) यानी महिलाओं के खतना की प्रथा पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता और मानवीय गरिमा के अधीन है। सबरीमाला मामले के साथ इस याचिका की सुनवाई हो रही है। याचिकाकर्ता इसे महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा का उल्लंघन बताते हैं, जबकि समुदाय के कुछ वकील इसे धार्मिक आस्था से जोड़ते हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची समेत कई जजों ने स्वास्थ्य आधार पर रोक की बात कही।

सुप्रीम कोर्ट में FGM मामले की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण?

भारत के सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े बड़े मुद्दे पर बहस चल रही है। 9 जजों की इस संवैधानिक पीठ के सामने दाऊदी बोहरा समुदाय में चल रही फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी जुड़ गई हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमानुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची शामिल हैं।

यह सुनवाई इसलिए खास है क्योंकि सबरीमाला मामले में अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक अधिकारों की सीमाओं पर फैसला होगा, जो FGM मामले पर भी असर डालेगा। कोर्ट धार्मिक आजादी और महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन ढूंढ रहा है।

FGM प्रथा क्या है और इसका महिलाओं पर क्या असर?

फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) में छोटी लड़कियों, अक्सर 7 साल की उम्र में, उनके जननांगों के कुछ हिस्से को काटा या हटाया जाता है। याचिकाकर्ताओं के वकील सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि इसमें क्लिटोरिस के आसपास की त्वचा हटाई जाती है, जिससे 10,000 से ज्यादा नर्व एंडिंग्स को स्थायी नुकसान पहुंचता है।

यह प्रक्रिया बच्चियों की शारीरिक, प्रजनन और भावनात्मक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर डालती है। लूथरा ने कहा कि यह बदलाव कभी ठीक नहीं किया जा सकता। कई परिवार सामाजिक दबाव के कारण इसे मानते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि समाज उन्हें अलग कर देगा।

याचिकाकर्ताओं का तर्क: महिलाओं का अधिकार और स्वास्थ्य

याचिकाकर्ता कहते हैं कि FGM महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है। सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 26 के तहत समुदाय को इसका संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

उन्होंने जोर दिया कि नाबालिग बच्चियां सहमति नहीं दे सकतीं, इसलिए यह प्रथा गलत है। लूथरा ने बताया कि दुनिया के 59 देशों में FGM पर प्रतिबंध लगा हुआ है। उन्होंने कोर्ट से समुदाय के अंदर की सामाजिक संरचना और दबाव को भी समझने की अपील की।

जस्टिस बागची की महत्वपूर्ण टिप्पणी: स्वास्थ्य आधार पर रोक संभव

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची की टिप्पणियां सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं। उन्होंने कहा कि FGM जैसे मामले में बहुत जटिल संवैधानिक बहस की जरूरत नहीं पड़ सकती। अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन दी गई है।

जस्टिस बागची ने कहा, “महिलाओं के खतना के मामले में सिर्फ स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही काफी हो सकते हैं।” उन्होंने प्रथा का उद्देश्य महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करना बताया। जस्टिस नागरत्ना ने नैतिकता के आधार पर भी सवाल उठाया।

समुदाय का पक्ष: धार्मिक आस्था और यौन सुख का दावा

दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि FGM को अंग-भंग कहना गलत है। उन्होंने इसे पुरुषों के खतना (सर्कमसिजन) से तुलना की। पाशा का दावा था कि इस प्रथा का मकसद महिलाओं के यौन सुख को बढ़ाना है, जिसकी तुलना उन्होंने हुडेक्टॉमी से की।

जस्टिस अमानुल्लाह ने इस दावे पर हैरानी जताई और कहा कि यह याचिकाकर्ताओं के तर्क के विपरीत है। जस्टिस बागची ने FGM और पुरुष सर्कमसिजन में सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर बड़ा अंतर बताया। पाशा ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रथा न मानने पर समुदाय से बहिष्कार नहीं होता, न ही कोई सामाजिक सजा मिलती है।

कोर्ट के सवाल और आगे की दलीलें

जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि अगर कोई धार्मिक प्रथा अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। लूथरा ने हां में जवाब दिया। जस्टिस वराले ने प्रथा के प्रभाव को कई गुना बताया।

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि नाबालिगों पर प्रथा लागू होती है और इसमें सहमति का सवाल नहीं उठता। साथ ही, बहिष्कार के डर और सामाजिक दबाव की जांच की जरूरत पर जोर दिया गया।

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और सीमाएं

भारतीय संविधान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सभी को धार्मिक आजादी देता है, लेकिन यह स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में धार्मिक प्रथाओं की जांच कर चुका है जब वे व्यक्तिगत अधिकारों से टकराती हैं।

FGM मामले में कोर्ट महिलाओं की शारीरिक और मानसिक समग्रता, स्वास्थ्य प्रभाव और सामाजिक मजबूरियों को देख रहा है। यह फैसला सिर्फ दाऊदी बोहरा समुदाय के लिए नहीं बल्कि समान मुद्दों के लिए मिसाल बन सकता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की जिम्मेदारी

दुनिया भर में FGM को मानवाधिकार उल्लंघन माना जाता है। कई देशों ने कानून बनाकर इसे रोका है। भारत में भी महिला स्वास्थ्य और बाल अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता के लक्ष्यों से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता चाहते हैं कि प्रथा को अनिवार्य न माना जाए और लड़कियों को सुरक्षित रखा जाए। समुदाय चाहता है कि उनकी आस्था का सम्मान हो। कोर्ट दोनों पक्षों को सुनकर संतुलित फैसला देगा।

आगे क्या?

सुनवाई अभी जारी है। कोर्ट तथ्यों, स्वास्थ्य रिपोर्ट्स और कानूनी दलीलों पर गौर कर रहा है। यह मामला दिखाता है कि आधुनिक भारत में धार्मिक स्वतंत्रता कैसे व्यक्तिगत गरिमा और स्वास्थ्य के साथ संतुलित होनी चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि FGM की पुरुष खतना से तुलना उचित नहीं क्योंकि स्वास्थ्य प्रभाव अलग हैं। अंतिम फैसला आने के बाद इस प्रथा के भविष्य पर असर पड़ेगा।

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