मुंबई/तालासरी। मात्र ₹2,000 की मामूली बचत से शुरू हुआ एक निःस्वार्थ प्रयास आज 85,000 से अधिक जरूरतमंद आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य और उम्मीद की किरण बन चुका है। मुंबई से महज 70 मील की दूरी पर स्थित पालघर जिले के तालासरी गांव में डॉ. जतिन नंदलाल वालिया की यह प्रेरणादायक पहल बिना किसी बड़े फंड या सरकारी मदद के सामाजिक बदलाव की एक ऐतिहासिक कहानी लिख रही है।
पत्थरों की मार से शुरू हुआ विश्वास का सफर
तालासरी एक ऐसा अधिसूचित आदिवासी क्षेत्र है जो देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के बेहद करीब होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं से दशकों पीछे रहा है। जब मार्च 2012 में होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. जतिन वालिया ने पहली बार यहाँ कदम रखा, तो शुरुआत बेहद कठिन थी। झूठे वादों और प्रचार-प्रसार के लिए आने वाली अन्य गैर-सरकारी संस्थाओं का कड़वा अनुभव झेल चुके आदिवासियों ने उनका स्वागत पत्थरों से किया।
गाँव वालों के इस भारी विरोध के बावजूद डॉ. वालिया पीछे नहीं हटे। उन्होंने हर रविवार को नियमित रूप से तालासरी जाकर मरीजों का इलाज करना जारी रखा। धीरे-धीरे ग्रामीणों का गुस्सा और संदेह खत्म हुआ और वह विश्वास में बदल गया। आज हालात यह हैं कि आसपास के क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि 20 किलोमीटर दूर-दराज के गांवों से भी लोग इलाज कराने उनके क्लीनिक पहुँच रहे हैं।

11 और 12 साल के बाल स्वयंसेवक बने क्लीनिक की रीढ़
तालासरी का यह साधारण क्लीनिक हर हफ्ते एक बड़ा रूप ले लेता है, जहाँ 60 से 100 मरीज अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में डॉ. वालिया को दो स्कूली बच्चों—अनमोल चौहान (11 वर्ष) और नैतिक हरजान (12 वर्ष)—का असाधारण सहयोग मिल रहा है।
ये दोनों बच्चे मरीजों के केस पेपर तैयार करने, ब्लड प्रेशर (BP) चेक करने, लाइन व्यवस्थित करने और दवाएं बांटने का काम बड़ी जिम्मेदारी से संभालते हैं। वे सिर्फ क्लीनिक का काम नहीं देख रहे, बल्कि कम उम्र में ही निःस्वार्थ समाज सेवा और मानवीय मूल्यों के पाठ सीख रहे हैं।
85 हजार से अधिक मरीजों को मिला इलाज, 1 लाख लोगों के सर्वे की तैयारी
ट्रस्ट के माध्यम से अब तक लगभग 85,000 मरीज लाभान्वित हो चुके हैं। हालांकि, डॉ. वालिया इसे केवल आंकड़ों की सफलता नहीं मानते, बल्कि उनका ध्यान हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण इलाज देने पर है।
अब उनका अगला लक्ष्य 1 लाख से अधिक आदिवासी ग्रामीणों के स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा का घर-घर जाकर सर्वे (Door-to-door Screening) करना है। इस योजना का मकसद बीमारी के गंभीर होने से पहले प्राथमिक स्तर पर ही उसका पता लगाना है। साथ ही, सर्वेक्षण के दौरान पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों (Education Dropouts) की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

यूके के डॉक्टर की मदद से 4 घंटे का पाठ अब 40 मिनट में
स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़े तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं। ब्रिटेन में कार्यरत उद्यमी डॉक्टर रचित बजाज ने इस मिशन से जुड़कर स्थानीय शिक्षकों और बच्चों को डिजिटल लर्निंग की आधुनिक ट्रेनिंग देने का बीड़ा उठाया है। इस नई पहल की मदद से बच्चे 4 घंटे का पढ़ाई का पाठ्यक्रम महज 40 मिनट में आसानी से सीख सकेंगे।
इसके अलावा, हर साल दिवाली के मौके पर डॉ. वालिया की टीम आदिवासियों के घर जाकर घरेलू उपयोग की वस्तुओं जैसे – बर्तन, कपड़े, दालें, तेल, साबुन और पौष्टिक राशन के हैम्पर देकर खुशियाँ बांटती है।
नॉन-हीलिंग अल्सर के इलाज में नवाचार और भारतीय सेना की सेवा
डॉ. जतिन वालिया की उपलब्धियां सिर्फ तालासरी तक सीमित नहीं हैं। साढ़े तीन दशक से अधिक के चिकित्सकीय अनुभव के साथ उन्होंने गंभीर घावों, बेड सोर्स और गैंग्रीन जैसे नॉन-हीलिंग अल्सर के इलाज के लिए होम्योपैथिक तरल और मलम आधारित ‘कुरा डिक्यूबिटस’ (Kura Decubitus) उपचार विकसित किया है।
वह स्पोर्ट्स होम्योपैथी के क्षेत्र में भी अग्रणी माने जाते हैं, जहाँ डोपिंग-मुक्त तरीकों से एथलीटों की रिकवरी में मदद की जाती है। इसके अतिरिक्त, डॉ. वालिया भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के जवानों के लिए भी नियमित चिकित्सा शिविर आयोजित करते हैं। भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित अखनूर में आयोजित उनका होम्योपैथिक मेडिकल कैंप उनके करियर के सबसे गर्व के पलों में से एक है।
तालासरी मिशन यह साबित करता है कि किसी बड़े बदलाव के लिए बड़ी पूंजी की नहीं, बल्कि अटूट संकल्प और सेवा भावना की जरूरत होती है।

