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MIFF-2026 : तकनीक के विकास के बावजूद फिल्म समारोहों का मूल स्वरूप बरकरार रहेगा

अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ- 2026) के पांचवें और अंतिम ओपन फोरम में आज वक्ताओं ने कहा कि भले ही स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल टेक्नोलॉजी और फिल्में देखने की बदलती आदतें सिनेमा की दुनिया को बदल रही हैं, फिर भी फिल्म फेस्टिवल खोज, सीखने और सामूहिक अनुभव के मंच के तौर पर अपनी अहमियत बनाए हुए हैं।

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मुंबई/ सुन्रील पाण्डेय : अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ- 2026) के पांचवें और अंतिम ओपन फोरम में आज वक्ताओं ने कहा कि भले ही स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल टेक्नोलॉजी और फिल्में देखने की बदलती आदतें सिनेमा की दुनिया को बदल रही हैं, फिर भी फिल्म फेस्टिवल खोज, सीखने और सामूहिक अनुभव के मंच के तौर पर अपनी अहमियत बनाए हुए हैं।
महोत्सव के दौरान इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (आईडीपीए) द्वारा आयोजित ‘चेंजिंग टेक्नोलॉजीज, चेंजिंग ऑडिएंस: आर फिल्म फेस्टिवल्स इन ट्रांजिशन’ शीर्षक वाले इस सत्र में फिल्म समारोहों के दिग्गजों ने एक साथ चर्चा की कि कैसे तकनीक दर्शकों की भागीदारी को बदल रही है और साथ ही फिल्म समारोहों के स्थायी मूल्य की परीक्षा ले रही है।

—एमआईएफएफ ओपन फोरम में विशेषज्ञों की राय –
—पैनलिस्टों ने ‘फर्जी फिल्म समारोहों’ के आयोजनों पर रोक लगाने के लिए सरकार से कार्रवाई की मांग की

इस सत्र में बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के संस्थापक सदस्य और पूर्व आर्टिस्टिक डायरेक्टर विद्याशंकर एन.; इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) के.जी. सुरेश; फिल्म समीक्षक और महोत्सव सलाहकार प्रेमेंद्र मजूमदार तथा पुणे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (पीआईएफएफ) की प्रमुख सदस्य अदिति अक्कलकोटकर शामिल थे। चर्चा का संचालन फिल्म निर्माता और आईडीपीए के अध्यक्ष संस्कार देसाई ने किया।

चर्चा की शुरुआत करते हुए, बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के संस्थापक सदस्य और पूर्व आर्टिस्टिक डायरेक्टर विद्याशंकर एन. ने 2000 के दशक की शुरुआत में आई डिजिटल क्रांति के बाद से फिल्म समारोहों के क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यद्यपि तकनीक ने सिनेमा तक पहुँच को व्यापक रूप से सुगम बनाया है, लेकिन फिल्म समारोहों का मूलभूत उद्देश्य आज भी अपरिवर्तित है। उन्होंने कहा, ‘फिल्म समारोह सिनेमा के वास्तविक अनुभव के लिए होते हैं, न कि केवल जानकारी प्राप्त करने के लिए।’ संग्रहालयों से तुलना करते हुए, उन्होंने कहा कि ऑनलाइन उपलब्ध प्रचुर कंटेंट के बावजूद दर्शक आज भी गहन सांस्कृतिक अनुभवों की तलाश में रहते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘सिनेमा के मूल मूल्य आज भी अक्षुण्ण हैं और फिल्म समारोह उन चुनिंदा स्थानों में से हैं जो इन मूल्यों को जीवित रखे हुए हैं।’
श्री विद्याशंकर ने आगे कहा कि जहाँ युवा दर्शक फिल्म समारोहों में उभरती तकनीकों और सिनेमाई रुझानों को देखने के लिए आते हैं, वहीं पुराने दर्शक अक्सर पुरानी यादों (नॉस्टैल्जिया) से प्रेरित होकर आते हैं। इससे अलग-अलग पीढ़ियों के बीच एक अनोखा सांस्कृतिक माहौल बनता है।

प्रोफेसर (डॉ.) के. जी. सुरेश ने चर्चा का रुख सर्वाइवल से हटाकर ‘प्रासंगिकता’ की ओर मोड़ा। भारत भर में फिल्म समारोहों की बढ़ती संख्या को स्वीकार करते हुए, उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या जागरूक दर्शकों को तैयार करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘फिल्म समारोह सिनेमा का उत्सव तो हैं ही, लेकिन उन्हें सीखने का अनुभव भी होना चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा कि तकनीक सिनेमा को केवल तभी समृद्ध कर सकती है जब अच्छी क्वालिटी का कंटेंट उसकी धुरी बनी रहे। सिनेमा को शिक्षा और व्यवहार परिवर्तन के सबसे शक्तिशाली माध्यमों में से एक बताते हुए, प्रोफेसर सुरेश ने शिक्षण संस्थानों में फिल्म एप्रिसिएशन को शामिल करने और युवाओं को कम उम्र से ही सिनेमा से परिचित कराने की वकालत की।

अपनी व्यक्तिगत यात्रा को साझा करते हुए, अदिति अक्कलकोटकर ने बताया कि पुणे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (पीआईएफएफ) के साथ काम करने से सिनेमा के प्रति उनकी समझ का दायरा मुख्यधारा के मनोरंजन से कहीं आगे बढ़ा। उन्होंने कहा, “फिल्म फेस्टिवल ऐसी दुनिया के दरवाज़े खोलते हैं जिनसे दर्शक शायद ही कभी रूबरू हो पाते।” पीआईएफएफ के आयोजन में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, अक्कलकोटकर ने उन संवादों के महत्व पर जोर दिया जो फिल्मों के प्रदर्शन के अलावा होते हैं, जैसे फिल्म प्रेमियों का नेटवर्किंग करना, फिल्म निर्माताओं और दर्शकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान और क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा से परिचय।
एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए, प्रेमेंद्र मजूमदार ने डिजिटल युग में तथाकथित फिल्म समारोहों के अनियंत्रित प्रसार पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह स्वीकार किया कि तकनीक ने आयोजनों को सुगम बना दिया है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि कई ‘फर्जी फिल्म महोत्सव’ सामने आए हैं, जो वास्तविक सांस्कृतिक मंच के बजाय मुख्य रूप से कमर्शियल काम-काज के रूप में संचालित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘ये महोत्सव अक्सर ‘पे-टू-विन’ (शुल्क देकर पुरस्कार प्राप्त करने) जैसी संरचनाओं के माध्यम से फिल्म निर्माताओं का शोषण करते हैं और बिना किसी कानूनी व विनियामक मानदंडों का पालन किए संचालित होते हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि फिल्म निर्माताओं के हितों की रक्षा करने और महोत्सव की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा और अधिक सख्त निगरानी की आवश्यकता है।

चर्चा में फिल्म संस्कृति को पोषित करने में फिल्म सोसाइटियों की निरंतर भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया। मजूमदार और सुरेश, दोनों ने शैक्षिक पहल, कैंपस फिल्म सोसाइटियों और फिल्म अध्ययन कार्यक्रमों के विस्तार के माध्यम से जागरूक दर्शक वर्ग तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

दर्शकों के व्यवहार में निरंतर बदलाव

सत्र का समापन इस आम सहमति के साथ हुआ कि यद्यपि माध्यम, प्लेटफॉर्म और दर्शकों के व्यवहार में निरंतर बदलाव आ सकता है, लेकिन सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सिनेमाई खोज और फिल्मों (मूविंग इमेज) के सामूहिक उत्सव के रूप में फिल्म महोत्सवों की जगह अपूरणीय बनी रहेगी।

यह ओपन फोरम एमआईएफएफ 2026 के दौरान आईडीपीए द्वारा आयोजित पांच-भागों वाली चर्चा श्रृंखला का समापन था, जिसमें फिल्म निर्माताओं, विद्वानों और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने एक साथ आकर तेजी से बदलते टेक्नोलॉजी के दौर में सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री संस्कृति के भविष्य पर गहन विचार-विमर्श किया।

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