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सोमनाथ मंदिर पर हमले के 1000 साल पूरे: PM मोदी अमृत महोत्सव में करेंगे महा पूजा और कुंभाभिषेक

भारत के प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले को ठीक 1000 साल पूरे हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 मई को सोमनाथ पहुंच रहे हैं, जहां वे 'सोमनाथ अमृत महोत्सव' में हिस्सा लेंगे।

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नई दिल्ली: भारत के प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले को ठीक 1000 साल पूरे हो रहे हैं। 1026 में महमूद गजनवी के हमले के बाद से कई बार विदेशी आक्रमणों का सामना करने के बावजूद यह मंदिर हर बार लोगों की आस्था से फिर से खड़ा हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 मई को सोमनाथ पहुंच रहे हैं, जहां वे ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ में हिस्सा लेंगे। यह कार्यक्रम मंदिर के पुनर्निर्माण और उद्घाटन के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित हो रहा है। PM मोदी विशेष महा पूजा, कुंभाभिषेक और ध्वजारोहण समारोह में शामिल होंगे।

सोमनाथ मंदिर का गौरवशाली इतिहास और 1000 साल पुराना हमला

सोमनाथ मंदिर सौराष्ट्र तट पर स्थित है और यह हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है। 6 जनवरी 1026 को महमूद गजनवी लगभग 30,000 सैनिकों के साथ यहां पहुंचा था। तीन दिन की लड़ाई के बाद 8 जनवरी को उसकी सेना मंदिर परिसर में घुस गई। मंदिर की रक्षा कर रहे 50,000 से ज्यादा निहत्थे भक्तों की जान गई। गजनवी ने मंदिर की संपत्ति लूटी, जिसमें सोना, चांदी और रत्न शामिल थे। उसने शिवलिंग को क्षति पहुंचाई और मंदिर की संपत्ति गजनी ले गया।

यह हमला सोमनाथ मंदिर पर हुआ पहला बड़ा विदेशी आक्रमण था। इसके बाद भी 11वीं से 18वीं शताब्दी के बीच मंदिर पर कई बार हमले हुए। हर बार स्थानीय राजाओं और लोगों की आस्था ने मंदिर को फिर से बनाया। राजा भीमदेव और परमार राजा भोज ने गजनवी के हमले के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।

आजादी के बाद पुनर्निर्माण: सरदार पटेल का संकल्प

भारत की आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम सरदार वल्लभभाई पटेल ने शुरू किया। 13 नवंबर 1947 को दिवाली के समय एक यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिर को फिर से बनाने का फैसला लिया। आधुनिक मंदिर का निर्माण सरदार पटेल के प्रयासों से हुआ। 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की।

यह मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में बना है। इसमें गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप हैं। शिखर की ऊंचाई 155 फीट है। महारानी अहिल्याबाई होलकर ने भी पहले जीर्णोद्धार कराया था।

PM मोदी का सोमनाथ मंदिर से गहरा जुड़ाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं। उन्होंने कई बार इस पवित्र स्थल का दौरा किया है।

  • 10-11 जनवरी 2026: सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में शामिल हुए।
  • 2 मार्च 2025: मंदिर में पूजा-अर्चना और रुद्र अभिषेक किया।
  • 20 नवंबर 2022: पूजा-अर्चना की।
  • 20 अगस्त 2021: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कई प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया।
  • 8 मार्च 2017: प्रधानमंत्री के रूप में पहला दौरा।
  • 1 फरवरी 2014: गुजरात मुख्यमंत्री रहते स्वर्ण शिखर का उद्घाटन किया।
  • 11 मई को वे विशेष महा पूजा, कुंभाभिषेक और ध्वजारोहण में हिस्सा लेंगे।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल पूरे होने पर आयोजन

गजनवी के हमले के 1000 साल पूरे होने पर 8 से 11 जनवरी 2026 तक ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया गया। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम हुए, जिनमें PM मोदी भी शामिल हुए थे। यह पर्व आस्था और स्वाभिमान को याद दिलाता है।

सोमनाथ मंदिर: धार्मिक महत्व

श्री सोमनाथ महादेव को आदि ज्योतिर्लिंग माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां चंद्रमा ने तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया। यह वह स्थान भी है जहां भगवान श्री कृष्ण की अंतिम यात्रा हुई थी। मंदिर का निर्माण चार चरणों में हुआ – सोने, चांदी, लकड़ी और पत्थर से।

स्वामी विवेकानंद का सोमनाथ से संबंध

1890 में स्वामी विवेकानंद सोमनाथ आए थे। 1897 में चेन्नई में दिए एक भाषण में उन्होंने कहा कि ऐसे मंदिर हमें राष्ट्रीय इतिहास और जीवन-धारा सिखाते हैं। उन्होंने कहा कि सौ बार नष्ट होने के बाद भी ये मंदिर फिर से मजबूत होकर खड़े होते हैं।

2001 का ऐतिहासिक क्षण

31 अक्टूबर 2001 को सोमनाथ मंदिर में पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी मौजूद थे।

राम रथ यात्रा भी 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से ही शुरू हुई थी, जो अयोध्या राम जन्मभूमि से जुड़ी थी।

सोमनाथ मंदिर आज

आज सोमनाथ मंदिर भव्य रूप में खड़ा है। लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। मंदिर ट्रस्ट विभिन्न विकास कार्य करता है। PM मोदी के नेतृत्व में यहां कई सुविधाएं बढ़ाई गई हैं।

यह मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। सदियों की संघर्ष गाथा के बावजूद आस्था यहां अटूट रही है।

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