कठुआ। जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले स्थित दूरस्थ सरथल घाटी में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना ने छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर दी है। सीधे बैंक खातों में आने वाली सरकारी वित्तीय सहायता के बूते किसान अब आलू और मौसमी सब्जियों की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं, जिसकी आपूर्ति स्थानीय बाजारों के साथ-साथ पंजाब और हिमाचल प्रदेश की मंडियों तक हो रही है।
बीज और सिंचाई की चिंता दूर, कर्ज से मिली मुक्ति
सरथल घाटी के पर्वतीय इलाके में रहने वाले कृषक पहले संसाधनों के अभाव में केवल घरेलू जरूरत भर के लिए ही खेती कर पाते थे। सबसे बड़ी चुनौती बीज, उर्वरक और सिंचाई व्यवस्था के लिए समय पर पूंजी जुटाना थी।
बदलते हालातों पर तहसील बानी के स्थानीय किसान प्रीतम सिंह ने बताया कि पीएम-किसान योजना के तहत हर चार महीने में मिलने वाली 2,000 रुपये की किस्त छोटे किसानों के लिए संबल बनी है। इस राशि से वे बिना किसी कर्ज के उन्नत किस्म के बीज और खाद खरीद रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमने सरथल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आलू उगाने का काम शुरू किया है। इस उत्पाद की सप्लाई अब पूरे जम्मू-कश्मीर के अलावा पड़ोसी राज्य पंजाब में भी हो रही है।”
व्यावसायिक स्तर पर सब्जी उत्पादन और भाड़ा लागत में राहत
पीएम-किसान की बदौलत पहाड़ी ढलानों पर बसे किसानों का दृष्टिकोण बदला है। अब यहाँ आलू के साथ मटर, गोभी और अन्य सब्जियों का उत्पादन व्यावसायिक पैमाने पर हो रहा है। किसानों का कहना है कि समय पर मिलने वाली आर्थिक मदद से वे ट्रैक्टर का भाड़ा, खेत की जुताई, मजदूरों की दिहाड़ी और परिवहन खर्च आसानी से निकाल लेते हैं, जिससे उनकी फसलें समय पर मंडियों तक पहुँच जाती हैं और उत्पाद खराब होने का जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
कृषि विभाग द्वारा दिए जा रहे तकनीकी परामर्श और गुणवत्तापूर्ण बीजों के इस्तेमाल से प्रति एकड़ पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। प्रीतम सिंह ने क्षेत्र के अन्य सीमांत किसानों का आह्वान किया कि वे सरकारी योजनाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ उठाकर सब्जी उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करें।
कृषि विभाग ने माना योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव
कठुआ जिला कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरथल घाटी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में पीएम-किसान योजना के साथ-साथ प्रशिक्षण व तकनीकी मार्गदर्शन का दोहरा प्रभाव देखने को मिला है। सरकारी योजनाओं के संयोजन से पहाड़ी क्षेत्रों के किसान आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
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