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कभी हाथों में थी बंदूक, अब छत्तीसगढ़ हैंडलूम पहन रैंप वॉक; आत्मसमर्पित नक्सली ने महिलाओं पेश की बस्तर की नई तस्वीर

रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर सुकमा की 9 आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ हैंडलूम परिधानों में रैंप वॉक किया। सीएम ने 'कोशल फैब' ब्रांड भी लॉन्च किया।

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रायपुर। हिंसा का रास्ता त्यागकर समाज की मुख्यधारा में शामिल हुईं सुकमा जिले की 9 आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर में आयोजित बुनकर सम्मेलन के मंच पर पारंपरिक ‘छत्तीसगढ़ हैंडलूम’ परिधानों में रैंप वॉक कर एक नया इतिहास रच दिया।

राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित इस राज्यस्तरीय समारोह में पूर्व नक्सलियों का यह आत्मविश्वास बदलते बस्तर और राज्य सरकार की पुनर्वास नीतियों की सफलता का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा।

कोसा सिल्क को वैश्विक पहचान देने ‘कोशल फैब’ ब्रांड का शुभारंभ

इसी भव्य मंच से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ की विश्वप्रसिद्ध कोसा सिल्क विरासत को नए व्यावसायिक आयाम देने के लिए ‘कोशल फैब’ (Koshal Fab) नामक नए ब्रांड का भी आधिकारिक शुभारंभ किया।

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने रैंप वॉक करने वाली महिलाओं से व्यक्तिगत रूप से आत्मीय संवाद किया और उनके निर्णय व साहस की सराहना करते हुए उन्हें उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद दिया। पहली बार राजधानी पहुंची इन महिलाओं के लिए हिंसा की खौफनाक यादों से निकलकर सार्वजनिक मंच की सुर्खियों तक पहुंचना एक अविस्मरणीय और भावुक पल रहा।

मुंबई के विशेषज्ञों से मिला 7 दिवसीय विशेष प्रशिक्षण

मुख्यधारा से जुड़ने के बाद इन महिलाओं को केवल समाज में सम्मान ही नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए गए हैं।

रैंप पर उतरने से पहले मुंबई से बुलाए गए पेशेवर ट्रेनरों ने महिलाओं को लगातार सात दिनों तक ग्रूमिंग, रैंप वॉक, परिधान प्रस्तुति और मंच पर बेझिझक बोलने की विशेष कला सिखाई। इस गहन प्रशिक्षण ने उनके भीतर छिपे संकोच को दूर कर उन्हें अटूट आत्मविश्वास से भर दिया।

पुनर्वास नीति का धरातल पर असर

कभी बस्तर के दुर्गम और घने जंगलों में हाथों में हथियार थामने को मजबूर रहीं ये महिलाएं अब राज्य के समृद्ध हथकरघा उद्योग और हस्तशिल्प कला का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से इन्हें न केवल सम्मानजनक रोजगार से जोड़ा जा रहा है, बल्कि यह संदेश भी दिया जा रहा है कि बस्तर की पहचान अब हिंसा से नहीं, बल्कि स्थानीय हुनर, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पहचान से तय होगी।

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