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निरंकारी भक्ति पर्व समागम: भक्ति केवल शब्द नहीं, जागरूक जीवन जीने की यात्रा है: माता सुदीक्षा जी महाराज

समालखा, हरियाणा में आयोजित संत निरंकारी मिशन के भक्ति पर्व समागम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए बताया कि भक्ति सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग यात्रा है। 12 जनवरी को हुए इस दिव्य आयोजन में निरंकारी राजपिता रमित जी के साथ माता जी के सान्निध्य […]

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समालखा, हरियाणा में आयोजित संत निरंकारी मिशन के भक्ति पर्व समागम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए बताया कि भक्ति सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग यात्रा है। 12 जनवरी को हुए इस दिव्य आयोजन में निरंकारी राजपिता रमित जी के साथ माता जी के सान्निध्य में दिल्ली-एनसीआर और देश-विदेश से आए भक्तों ने सत्संग, सेवा और समर्पण के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया।

समागम में संत संतोख सिंह जी जैसे महापुरुषों का स्मरण किया गया और भक्ति के सच्चे अर्थ पर प्रकाश डाला गया। यह कार्यक्रम निरंकारी मिशन की शिक्षाओं को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ, जहां श्रद्धालुओं ने ब्रह्मज्ञान को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

समागम का आयोजन और श्रद्धालुओं की भागीदारी

संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल, समालखा में भक्ति पर्व समागम का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया गया। यहां हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए, जो दिल्ली-एनसीआर के अलावा भारत के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से आए थे। कार्यक्रम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता रमित जी का पावन सान्निध्य सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।

श्रद्धालुओं ने सत्संग के जरिए आध्यात्मिक उल्लास का अनुभव किया और आत्मिक शांति प्राप्त की। इस अवसर पर भक्ति भाव से भरे गीत, कविताएं और प्रवचन सुनाए गए, जो मानव कल्याण और गुरु महिमा पर केंद्रित थे। समागम की पूरी व्यवस्था संत निरंकारी मिशन के सिद्धांतों के अनुरूप थी, जहां हर कोई सेवा और समर्पण की भावना से जुड़ा हुआ था।

सतगुरु माता सुदीक्षा जी के मुख्य विचार

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने प्रवचन में भक्ति के गहन अर्थ को समझाया। उन्होंने कहा कि भक्ति कोई नाम या दिखावा नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति में व्यक्ति पहले खुद को जांचता है, अपनी कमियां सुधारता है और हर पल जागरूक रहकर जीवन जीता है। माता जी ने जोर दिया कि अज्ञान से हुई गलती को सुधारा जा सकता है, लेकिन जानबूझकर किसी को चोट पहुंचाना या बहाने बनाना भक्ति नहीं है।

भक्त का स्वभाव हमेशा मरहम जैसा होना चाहिए, जहां हर इंसान में निराकार को देखकर सरल और निष्कपट व्यवहार किया जाए। ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद सेवा, सुमिरन और सत्संग से इस भावना को बनाए रखना ही सच्ची भक्ति है। माता जी ने अंत में कहा कि भक्ति एक चुनाव है – नाम की नहीं, बल्कि जीवन की। उनके ये शब्द श्रद्धालुओं के दिलों को छू गए और उन्हें आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाया।

निरंकारी राजपिता रमित जी के संदेश

समागम में निरंकारी राजपिता रमित जी ने भी भक्ति पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने समझाया कि भक्ति कोई पद, पहचान या अपनी बनाई हुई परिभाषा नहीं है। यह ब्रह्मज्ञान पाकर करता-भाव को खत्म करने से उपजा जीवन जीने का तरीका है। राजपिता जी ने कहा कि संतों ने गुरु के वचनों को इसलिए माना क्योंकि उनके लिए यह स्वाभाविक था, जबकि हम कभी-कभी न मानने को भी सही ठहरा लेते हैं। सत्य और भक्ति की परिभाषा एक ही है, और अगर इसे उपलब्धियों या अहंकार से जोड़ा जाए तो करता-भाव बना रहता है। भक्ति कोई सौदा नहीं, बल्कि प्रेम का चुनाव है, जहां प्रयास तो होते हैं लेकिन दावा नहीं। उन्होंने अरदास की बात की कि अपनी सभी परिभाषाओं को छोड़कर ऐसा जीवन जिएं जहां वचन मानना, सेवा करना, सुमिरन और संगत स्वभाव बन जाए। राजपिता जी के ये विचार भक्ति के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करते हैं।

महापुरुषों का स्मरण और प्रेरणा

इस पावन अवसर पर परम संत संतोख सिंह जी और अन्य संत महापुरुषों के तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में दिए गए योगदान को भावपूर्ण तरीके से याद किया गया। श्रद्धालुओं ने उनके जीवन से प्रेरणा ली और भक्ति, सेवा तथा समर्पण के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया। सतगुरु माता जी ने माता सविंदर जी और राजमाता जी के जीवन को भक्ति, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इन मातृशक्तियों का पूरा जीवन निरंकारी मिशन के लिए समर्पित रहा, जो हर श्रद्धालु को प्रेरित करता है। निरंकारी मिशन का मूल सिद्धांत यही है कि भक्ति परमात्मा के तत्व को जानकर ही सार्थक होती है। इन स्मरणों ने समागम को और अधिक भावुक बना दिया।

समागम में वक्ताओं और कलाकारों का योगदान

समागम के दौरान कई वक्ताओं, कवियों और गीतकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने गुरु महिमा, भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेशों को भावपूर्ण तरीके से व्यक्त किया। इन शिक्षाओं ने उपस्थित श्रद्धालुओं के मन को छुआ और उनके जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध किया। कार्यक्रम में सत्संग के माध्यम से सभी ने एकजुट होकर आनंद लिया। यह आयोजन निरंकारी मिशन की एकता और भाईचारे को दर्शाता है, जहां हर कोई बिना किसी भेदभाव के जुड़ता है।

भक्ति पर्व का महत्व

भक्ति पर्व समागम निरंकारी मिशन के लिए एक वार्षिक उत्सव है, जो भक्तों को आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाता है। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को ब्रह्मज्ञान के जरिए भक्ति के असली अर्थ को समझने और इसे रोजमर्रा के जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। यह कार्यक्रम न केवल धार्मिक था, बल्कि जीवन की सजगता सिखाने वाला भी। समालखा में हुआ यह समागम आने वाले समय में भी श्रद्धालुओं को प्रेरित करता रहेगा। निरंकारी मिशन की शिक्षाएं विश्व शांति और मानव एकता पर जोर देती हैं, जो आज के समय में बहुत जरूरी हैं।

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