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Thursday, June 17, 2021
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विधुर का विवाह ठोक-बजाकर करते हैं तो विधवा का क्यों नहीं…?

—विधवा पुनर्विवाह से संबंधित कड़े कानून बनाने होंगे, ध्यान दें सरकारें
—पुरूष प्रधान समाज में इज्ज़त केवल पुरुष की ही मानी जाती है
—पति मृत्यु के बाद सफेद दुपट्टा डाल कर उसे दिलाया जाता है अहसास

(प्रेम बजाज)
विधवा पुनर्विवाह एक ऐसा संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय है जिस पर अधिकतर लोग 21 वीं सदी के होते हुए भी नाक मुंह सिकोड़ने लग जाते हैं।
विधवा पुनर्विवाह क्यों विवादास्पद है?? पुनर्विवाह मुद्दे पर इतनी तकलीफ़ क्यों ?? आधुनिक काल में शिक्षित समाज में बेशक विधवा पुनर्विवाह को बुरा नहीं माना जाता, मगर अभी भी अशिक्षित एवं कट्टर धार्मिक लोग इसके खिलाफ हैं, जहां विधवा की स्थिति सोचनीय है।
अथर्ववेद में विधवा पुनर्विवाह का उल्लेख मिलता है, ‘अल्टेकर के अनुसार, ” विधवा पुनर्विवाह वैदिक समाज में प्रचलित था” कोटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विधवा पुनर्विवाह को स्वीकारा गया। उच्छंग जातक की कथाओं में भी विधवा पुनर्विवाह का आभास मिलता है, अर्थात प्राचीन भारत में विधवा पुनर्विवाह निषेध नहीं था। 300 ई. पू. से 200 वर्ष पश्चात तक के काल में विधवा पुनर्विवाह को अनुचित ठहराने के प्रमाण मिलते हैं। विधवाओं का जीवन नर्क बन जाने के कारण स्त्रियों ने पति के साथ जल जाना बेहतर समझा।


वह कौन सी जड़ें हैं जो इसका कारण बनती हैं??
विधवा उस महिला को कहा जाता है जिसके पति की किसी भी कारण से मृत्यु हो गई हो।
पुराने ज़माने में बाल विवाह का बहुत प्रचलन था, छोटी उम्र की लड़कियों का बड़ी उम्र के आदमी से विवाह करा दिया जाता था, विधवा जल्दी होने का एक यह भी कारण था, विधवा को हेय की दृष्टि से देखा जाता था।
हमारे पुरूष प्रधान समाज में इज्ज़त केवल पुरुष की ही मानी जाती है, एक महिला की इज्ज़त केवल पिता और पति से होती है, विवाह के समय भी स्त्री ( लड़की) को यही समझाया जाता है कि हंसी-खुशी, रूप-रंग, श्रृंगार सब पति के लिए ही है, अब तुम्हारा संसार पति से ही है।
जब किसी कारणवश उसका पति मर जाता है तो #सांसारिक सुख त्यागना पत्नी का धर्म माना जाता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि पति की चिता में ही अपना जीवन भस्म कर दे। वहीं दूसरी ओर जब किसी की पत्नी की मृत्यु होती है तो पुरुष बेझिझक दूसरा विवाह करता है, उसे किसी की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं, ना ही कोई पुरुष से सवाल करता है,
क्यों भला पुरुष के लिए ये पाबंदियां नहीं?
क्या ये समाज का दोहरा मापदंड नहीं?
यहां पुरुष बलशाली है और स्त्री मात्र भावहीन वस्तु बन कर रह गई है। समाज के अनुसार विधवा महिला को एक सम्मानित जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं, अच्छा खाना, कपड़ा पहनने का अधिकार नहीं उसे एक नीरस जीवन जीने पर बाध्य किया जाता है, कहीं -कहीं तो विधवा औरत के लंबे काले घने बाल कटवाकर उसका मुंडन करवा दिया जाता है। कुछ परिवारों में बेटे की मृत्यु के बाद बहु से रिश्ता ही नहीं रखा जाता कि अब बेटा ही नहीं रहा तो बहु से क्या रिश्ता। मजबूरन विधवा को कोई और सहारा ना मिलने की अवस्था में विधवा आश्रम में रहना पड़ता है, जीवन तो केवल नाममात्र शेष रह जाता है।

हमारे समाज में महिलाएं खुल कर नहीं जी सकती, जीवन के हर पड़ाव पर उन्हें दूसरे का सहारा लेना पड़ता है, बचपन से ही इन्हें सिखाया जाता है कि वो सशक्त नहीं है, प्रबल नहीं है, दुर्बल हैं। अगर कोई महिला इस रूढ़िवादी प्रथा को स्वीकार नहीं करती तो उसे कठिन परिस्थितियों का, कदम-कदम पर कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।

किसी भी शुभ कार्यों में विधवा स्त्री को जाने की अनुमति नहीं, विधुर को कुछ नहीं

हमारे समाज में विधवा होने पर अजीब-अजीब रीति-रिवाजों के नाम कर भी स्त्री को प्रताड़ित किया जाता है, पति मृत्यु के बाद सरेआम बिरादरी एवं बंधुओं, समाज के समक्ष उस पर सफेद चादर या कहीं सफेद दुपट्टा डाल कर उसे अहसास दिलाया जाता है कि वो विधवा है, तिल-तिलकर मरने के लिए उसे छोड़ देते हैं, इससे तो सती प्रथा ही ठीक था ताकि एक ही मौत मरती थी स्त्री। किसी भी शुभ कार्यों में विधवा स्त्री को जाने की अनुमति नहीं, जबकि विधुर को कोई कुछ नहीं कहता।जब स्त्री की मृत्यु पर पुरुष को दोष नहीं दिया जाता तो पुरुष की मृत्यु पर स्त्री को दोष क्यों?

ईश्वरचंद विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह कराया

165 वर्ष पहले 16 जुलाई 1856 को एक महत्वपूर्ण घटना घटी जो भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज की गई। ब्रिटिश सरकार ने इस दिन समाजसेवी ईश्वरचंद विद्यासागर के अकथ प्रयासो द्वारा विधवा पुनर्विवाह का कानून पास किया, कानून पास के महज चार महीने बाद ही प्रेसिडेंसी कालेज के एक प्रोफ़ेसर के घर ईश्वरचंद विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह कराया एवं इन्होंने अपने बेटे का विवाह भी एक विधवा से ही कराया। ईश्वरचंद विद्यासागर स्त्रियों के उत्थान के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे, समाज के कुछ लोग तो विद्या सागर को मसीहा मानते थे।

विधवा पुनर्विवाह केवल शारीरिक आवश्यकता ही नहीं…

विधवा जो समाज के व्यंग बाण, शंकाओं और गलतफहमियों का आघात झेलना पड़ता है, विधवा ही जानती है। विधवा पुनर्विवाह के निषेध का कारण अनेकों सामाजिक व्यभिचार और अनेतिक दुष्परिणामों की वृद्धि है, #काशी में एक कहावत प्रचलित है, “रांड, सांड, सीढ़ी,संन्यासी , इनसे बचे जो सेवे काशी”
जैसे कि कोई नवयौवना विधवाएं यौवन की प्यास बुझाने के लिए वैध उपाय ना होने के कारण अनैतिक संबंध बना लेती है, पर्दे कुछ आढ़ में व्यभिचार पलता है, बदनामी से बचने के लिए अनेकों भ्रुण हत्याएं एवं गर्भपात होते हैं, आजकल गर्भ निरोधक औषधियों के अविष्कार से भ्रष्टाचार और भी सुलभ हो गया है।

दूसरा दुष्परिणाम वेश्या वृद्धि है, भाषा विज्ञान की दृष्टि से रण्डी शब्द की उत्पत्ति रांड या रण्डा से हुई जो विधवा को कहा जाता है, असहाय विधवा के पास जीवन यापन का वेश्यावृत्ति के अलावा कोई और साधन ना होना भी वेश्या वृद्धि का कारण है, बाल विधवाओं से कठोर ब्रह्मचर्य के पालन की उम्मीद रखना मानव मनोविज्ञान के प्रति अज्ञानता का सूचक है, विधवा पुनर्विवाह का विरोध अमनोवैज्ञानिक मांग है जो समाज के लिए हानिकारक है। विधवा पुनर्विवाह केवल शारीरिक आवश्यकता ही नहीं, अपितु हर इन्सान एक साथी चाहता है जिससे वो अपने मन की हर बात कर सकें, जो वृद्धावस्था में उसका साथ दे सके।
क्या विधवा होना स्त्री के स्वयं के हाथ में हैं?
क्या विधवा होना अभिशाप है?
क्या पति की मृत्यु के बाद औरत को अपना जीवन खत्म कर देना चाहिए?
क्या पति की मृत्यु के बाद स्त्री की इच्छाएं खत्म हो जाती है?
क्या उसके अहसास, जज़्बात,अरमान नहीं?
क्या वो इन्सान नहीं, कोई प्लास्टिक की गुड़िया है?
क्या वो नए सिरे से अपनी जीवन की शुरुआत नहीं कर सकती?
इन सब सवालों का जवाब है किसी के पास?
नहीं! समाज तो इन विषयों पर बात तक करने में दिलचस्पी नहीं लेता। विधवा पुनर्विवाह केवल बातें ही होती है, व्यवहारिक रूप में अमल करना होगा। विधवा पुनर्विवाह से संबंधित कड़े कानून बनाने होंगे। विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करने से समाज उन वेश्याओं से बच सकता है, जो वैधव्य के कारण बनती है। जब हम विधुर का विवाह ठोक- बजाकर करते हैं तो विधवा का क्यों नहीं?

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