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रायपुर : ‘खेत बचाओ अभियान‘ के तहत NIBSM द्वारा हरी खाद तकनीक का सजीव प्रदर्शन

आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान (NIBSM) ने "खेत बचाओ अभियान" के अंतर्गत ग्राम बिठिया और मोहदी के किसानों के लिए हरी खाद की तकनीक पर जागरूकता कार्यक्रम और सजीव प्रदर्शन आयोजित किया।

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रायपुर। आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान (NIBSM) ने “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत ग्राम बिठिया और मोहदी के किसानों के लिए हरी खाद की तकनीक पर जागरूकता कार्यक्रम और सजीव प्रदर्शन आयोजित किया। इस कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय समेत अन्य वैज्ञानिकों ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों की जगह हरी खाद अपनाने के फायदे बताए और मूंग की फसल को मिट्टी में मिलाने का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया। 92 किसानों ने इसमें सक्रिय भाग लिया और तकनीक को मिट्टी की सेहत सुधारने का अच्छा तरीका बताया।

हरी खाद तकनीक पर जागरूकता कार्यक्रम

“खेत बचाओ अभियान” के तहत यह कार्यक्रम रायपुर के पास बिठिया और मोहदी गांवों में हुआ। आईसीएआर-एनआईबीएसएम के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने खासकर एससीएसपी और टीएसपी लाभार्थी किसानों के लिए किए जा रहे कामों पर रोशनी डाली। डॉ. राय ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना जरूरी है। मिट्टी की उर्वरता और लंबे समय तक अच्छी फसल पैदावार बनाए रखने के लिए टिकाऊ तरीके अपनाने चाहिए।

सजीव प्रदर्शन और फायदे

कार्यक्रम के दौरान संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने खेत में उगाई गई मूंग की फसल को कृषि यंत्रों की मदद से मिट्टी में मिलाने का सजीव प्रदर्शन किया। उन्होंने किसानों को समझाया कि हरी जैविक सामग्री जब मिट्टी में मिलती है तो उसका अपघटन होता है। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, पोषक तत्व आसानी से मिलने लगते हैं और कुल मिलाकर मिट्टी की उर्वरता अच्छी होती है।

डॉ. अनिल दीक्षित, संयुक्त निदेशक ने हरी खाद के महत्व पर विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि मूंग, धैंचा जैसी कई फसलों को हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मिट्टी को प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलता है, मिट्टी की सेहत सुधरती है और पानी रोकने की क्षमता भी बढ़ती है। रासायनिक खादों पर कम निर्भरता पड़ती है, जो किसानों के लिए फायदेमंद है।

किसानों की सक्रिय भागीदारी

इस मौके पर ग्राम बिठिया के सरपंच श्री दुश्यंत साहू और मोहदी की सरपंच श्रीमती कावेरी वर्मा भी मौजूद रहीं। कुल 92 किसानों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वैज्ञानिकों ने पर्यावरण के अनुकूल और जलवायु के हिसाब से टिकने वाली खेती के तरीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया।

कार्यक्रम में संवादात्मक सत्र भी रखा गया, जिसमें किसानों ने अपनी खेती संबंधी समस्याएं बताईं। वैज्ञानिकों ने उन्हें व्यावहारिक सलाह दी। किसानों ने हरी खाद तकनीक को अपनाने में खास रुचि दिखाई। उन्होंने इसे मिट्टी सुधारने और टिकाऊ खेती के लिए उपयोगी बताया।

कार्यक्रम का सफल आयोजन

डॉ. के.सी. शर्मा और डॉ. प्रियंका मीना ने कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने किसानों से बातचीत और तकनीकी जानकारी साझा करने में मदद की।

समापन पर वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और टिकाऊ खेती अपनाने की अपील की। उन्होंने “स्वस्थ मृदा, सशक्त किसान और समृद्ध भारत” के लक्ष्य को पूरा करने पर जोर दिया।

यह कार्यक्रम किसानों के लिए उपयोगी साबित हुआ। हरी खाद जैसी सरल और प्राकृतिक तकनीक से मिट्टी की सेहत सुधारना और अच्छी फसल लेना आसान हो सकता है। एनआईबीएसएम जैसे संस्थान लगातार किसानों को ऐसी जानकारी और ट्रेनिंग देकर सहयोग कर रहे हैं।

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