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ट्विन-पिट शौचालय से पैदा हो रही है ‘काली कंचन’ खाद, जानिए गुजरात के डांग जिले ने कैसे रचा इतिहास

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत गुजरात का डांग जिला ट्विन-पिट शौचालय (Twin-Pit Toilet) अपनाने में देश का मॉडल बना है। जानिए कैसे इस तकनीक से आदिवासियों ने फीकल स्लज मैनेजमेंट में कमाल किया।

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गांधीनगर। गुजरात के डांग जिले के आदिवासियों ने शायद स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत ट्विन-पिट शौचालयों को लोकप्रिय बनाने वाले अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर के विज्ञापन नहीं देखे होंगे, लेकिन उन्होंने इस टेक्नोलॉजी को इतनी प्रभावी ढंग से अपनाया है कि आज डांग जिला ग्रामीण स्वच्छता के क्षेत्र में देश के लिए एक मॉडल बना है।

घने जंगलों, हरियाले पहाड़ों और वर्षा ऋतु के आह्लादक दृश्यों के लिए विख्यात डांग जिला आज स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत फीकल स्लज मैनेजमेंट के महत्वपूर्ण घटक ट्विन-पिट शौचालयों के व्यापक स्वीकार के लिए भी पहचान प्राप्त कर रहा है।

जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए)-डांग के समन्वयक विपुल परदेशी ने कहा कि डांग जिले में तीन तहसीलें और 310 गांव हैं। डांग जिले की अनुमानित जनसंख्या 2.96 लाख है। जिले के कुल 58,966 परिवारों में से 51,613 परिवार ट्विन-पिट शौचालय अपना चुके हैं, जो जिले के कुल शौचालयों का लगभग 95 प्रतिशत है। फीकल स्लज मैनेजमेंट क्षेत्र में यह उल्लेखनीय उपलब्धि है। ये सब जन भागीदारी से संभव हुआ है। सरकार ट्विन-पिट शौचालय बनाने के लिए प्रत्येक परिवार को 12,000 रुपए की सहायता देती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में खुले में शौचमुक्ति का लक्ष्य प्राप्त करने और गांवों में ठोस तथा तरल कूड़ा प्रबंधन में सुधार लाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की शुरुआत की थी। उनके नेतृत्व में यह पहल स्वच्छता, महिलाओं की सुरक्षा और सर्वांगीण ग्रामीण स्वास्थ्य पर केंद्रित एक व्यापक जन जागरण तथा व्यवहार परिवर्तन अभियान में विकसित हुई है।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार को शौचालय उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है और स्वच्छता में देशभर में चोटी का स्थान प्राप्त किया है।

जनवरी 2026 में केन्द्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत लागू किए गए विभिन्न फीकल स्लज मैनेजमेंट मॉडलों की समीक्षा के लिए राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के जिलों के साथ एक वर्चुअल संवाद आयोजित किया था। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने की थी।

इस बैठक के दौरान विभिन्न राज्यों ने नवीन तथा व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले स्वच्छता मॉडल प्रस्तुत किए थे। बैठक में सुदूरवर्ती आदिवासी क्षेत्रों में ट्विन-पिट शौचालयों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए गुजरात के डांग जिले को विशेष उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

पाटिल ने भाग लेने वाले राज्यों की प्रशंसा करते हुए कहा था कि ऐसे स्वच्छता मॉडल केवल स्वच्छ भारत के विजन को साकार करने में ही सहायक नहीं बनते, बल्कि टिकाऊ कूड़ा प्रबंधन के माध्यम से रोजगार के अवसर भी सृजित करते हैं।

ट्विन-पिट शौचालय मानव मल को सुरक्षित रूप से विघटित कर पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में परिवर्तित करता है। ग्रामीण स्वच्छता ढांचे को मजबूत बनाने के साथ यह टेक्नोलॉजी भूमिगत जल प्रदूषण तथा असुरक्षित कूड़ा निस्तारण के जोखिम को कम करके सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की भी रक्षा करती है।

ट्विन-पिट शौचालय सामान्य शौचालय की तरह ही कार्य करता है, लेकिन इसकी विशेषता यह है कि यह मानव मल को सुरक्षित जैविक खाद में परिवर्तित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा भी इस टेक्नोलॉजी को प्रभावी तथा टिकाऊ स्वच्छता समाधान के रूप में मान्यता दी गई है।

सीवर व्यवस्था तथा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़े परंपरागत शौचालयों की तुलना में ट्विन-पिट शौचालय घर के स्तर पर ही कूड़े का प्रबंधन करता है। मानव मल पहले गड्ढे में जाता है, जहां उसका प्राकृतिक रूप से विघटन होता है। पहला गड्ढा भर जाने के बाद मल प्रवाह को दूसरे गड्ढे में मोड़ दिया जाता है। तब तक पहले गड्ढे में मौजूद मल पूरी तरह विघटित होकर सुरक्षित और पोषक तत्वों से भरपूर खाद में परिवर्तित हो जाता है, जिसे सरलता से बाहर निकालकर खाद के रूप में उपयोग में लिया जा सकता है।

इस प्रकार के शौचालय महंगी सीवर व्यवस्था की आवश्यकता को समाप्त करते हैं और भूमि एवं जल स्रोतों को प्रदूषित किए बिना कचरे का सुरक्षित प्रबंधन करते हैं।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों के निर्माण के लिए सरकार 12,000 रुपए की सहायता प्रदान करती है और स्थल पर ही कूड़ा प्रबंधन के लिए ट्विन-पिट टेक्नोलॉजी को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करती है।

ट्विन-पिट शौचालय लागत की दृष्टि से सस्ते हैं और इनमें परंपरागत फ्लश शौचालयों की तुलना में कम पानी की जरूरत पड़ती है। इसलिए ये ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अत्यंत अनुकूल होते हैं।

इस प्रणाली में सामान्यतः लगभग तीन फीट गहराई वाले दो गोलाकार गड्ढे आस-पास बनाए जाते हैं। गड्ढों की दीवारें मधुमक्खी के छत्ते (हनीकॉम्ब पैटर्न) के आकार की बनाई जाती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास की मिट्टी में आसानी से शोषित हो सके, जबकि गड्ढे के तल में कोई लाइनिंग नहीं की जाती है। सामान्यतः सीमेंट मोर्टार से युक्त ईंटों का उपयोग किया जाता है, परंतु स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पत्थर, लकड़ी के खंभे, कंक्रीट रिंग, पकी हुई मिट्टी या पुनः उपयोग किए गए ड्रमों का भी उपयोग हो सकता है।

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