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नेपाल में कुदरत का कहर, 5 दिन बाद भी 2500 लोग लापता और 788 की मौत, भारत ने भेजी 68 टन राहत सामग्री और बेली ब्रिज

Nepal Flood Crisis: नेपाल में बाढ़ से मौतों का आंकड़ा 788 पहुंचा, 2500 लोग अब भी लापता। भारत ने भेजी 68.5 टन राहत सामग्री और टनल रेस्क्यू टीम।

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काठमांडू (नेपाल)। नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के पांच दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति बेहद अनियंत्रित और भयावह बनी हुई है। त्रासदी में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर 788 तक पहुंच गई है, जबकि 2,500 से अधिक नागरिक अब भी लापता हैं। शवों की पहचान न हो पाने के कारण प्रशासन डीएनए सैंपल सुरक्षित रखकर बड़े पैमाने पर सामूहिक अंतिम संस्कार करने को मजबूर है।

उफान पर नदियां, दोबारा जलस्तर बढ़ने से राहत-बचाव कार्य में भारी बाधा

नेपाल के बड़े हिस्से में लगातार हो रही बारिश और नदियों के फिर से उफान पर आने के कारण राहत एवं बचाव अभियानों में गंभीर रुकावटें आ रही हैं। भोटेकोशी और त्रिशूली जैसी प्रमुख नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ने से तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की चेतावनी जारी की गई है।

तमाम मुश्किलों और खराब मौसम के बावजूद, आपदा प्रबंधन टीमों ने अब तक 9,435 से ज्यादा प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। हालांकि, मलबे और गाद के कारण कई दूरदराज के गांव पूरी तरह कटे हुए हैं, जहां तक पहुंचना बचाव कर्मियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

त्रिशूली नदी में बह गया 130 मीटर लंबा घ्यालचोक पुल, 400 परिवार अलग-थलग

मध्य नेपाल में बहने वाली त्रिशूली नदी के प्रचंड बहाव ने भारी तबाही मचाई है। नदी के तेज उफान के चलते करीब तीन घंटे के भीतर घ्यालचोक-चारौदी को जोड़ने वाला 130 मीटर लंबा पक्का पुल ढह गया। यह पुल गोरखा जिले के घ्यालचोक क्षेत्र को देश की जीवनरेखा माने जाने वाले ‘पृथ्वी हाईवे’ से जोड़ता था।

पुल के ध्वस्त हो जाने से इलाके के लगभग 400 परिवारों का बाहरी दुनिया से सीधा संपर्क पूरी तरह टूट गया है। इससे पहले 26 अगस्त को आई बाढ़ में धवादिघाट का पुल भी बह चुका था। अब इस दूसरे पुल के गिरने से स्थानीय ग्रामीणों और किसानों के सामने आवाजाही का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

किसानों पर पड़ा दोहरा प्रभाव: दूध और हरी सब्जियों की सप्लाई थमी

पुल केवल इंसानों की आवाजाही का साधन नहीं था, बल्कि स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी था। आसपास के सैकड़ों किसान इसी रास्ते से अपना दूध, ताजी सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद चारौदी स्थित कृषि सहकारी संस्था की मंडियों तक पहुंचाते थे।

अब मुख्य पुलों के अचानक टूट जाने के कारण किसानों की तैयार उपज खेतों और घरों में ही सड़ने की कगार पर है। वैकल्पिक रास्ते भी मलबे और पानी में बह जाने के कारण किसानों का व्यापार पूरी तरह ठप पड़ गया है।

रसुवा में भारी तबाही, चीन बॉर्डर जोड़ने वाली लाइफलाइन रोड आंशिक रूप से चालू

नेपाल का रसुवा जिला इस त्रासदी का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहाँ उफनती नदियों के साथ आए मलबे और गाद ने दर्जनों पक्के मकानों, दुकानों और बुनियादी ढांचे को जमींदोज कर दिया है।

नेपाल को चीन की सीमा से जोड़ने वाली सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से बेहद अहम सड़क का बड़ा हिस्सा पूरी तरह बह गया था, जिससे राहत सामग्री की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई थी। हालांकि, रात-दिन काम कर रही इंजीनियरिंग टीमों ने करीब 150 मीटर क्षतिग्रस्त सड़क को अस्थाई तौर पर वाहनों की आवाजाही के लिए तैयार कर दिया है, जबकि बाकी बचे क्षतिग्रस्त हिस्से को दुरुस्त करने का काम तेजी से जारी है।

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की अंधेरी सुरंगों में फंसी जिंदगियों को बचाने की जंग

बाढ़ का सबसे डरावना रूप जलविद्युत परियोजनाओं (Hydropower Projects) में देखने को मिल रहा है। रसुवा स्थित ‘अपर त्रिशूली-1’ प्रोजेक्ट की भूमिगत सुरंगों में दर्जनों मजदूर और कर्मचारी फंसे हुए हैं।

इन्हें बाहर निकालने के लिए नेपाली सेना के साथ-साथ भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के विशेष तकनीकी विशेषज्ञों (Technical Experts) की टीमें दिन-रात जुटी हुई हैं। भारतीय दल के विशेषज्ञ टनल के करीब 3 किलोमीटर अंदर तक दाखिल होकर सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं। भारतीय विशेषज्ञों के तकनीकी सहयोग से रसुवा क्षेत्र में बीते दो दिनों में 250 लोगों को सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका है। इसके अलावा लांगटांग और चिलिमे के दुर्गम क्षेत्रों में भी नेपाली सेना के साथ मिलकर साझा सर्च अभियान चलाया जा रहा है।

नुवाकोट में सेना ने किया कंट्रोल्ड ब्लास्ट, टनल में रास्ता बनाने की कोशिश

उधर, नुवाकोट जिले के ‘अपर त्रिशूली-3ए’ हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसी जिंदगियों को तलाशने के लिए सुरक्षा बल हर संभव जतन कर रहे हैं। सुरंग के मुहाने पर भारी मात्रा में पत्थर और मलबा जमा होने के कारण रास्ता पूरी तरह बंद हो गया था, जिसे हटाने के लिए सेना के इंजीनियर्स नियंत्रित विस्फोट (Controlled Blasting) का सहारा ले रहे हैं।

मौके पर नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल के स्निफर डॉग्स (Sniffer Dogs) और नेपाल पुलिस के उच्च अधिकारियों समेत करीब 90 विशेषज्ञों का दल तैनात है। रेस्क्यू टीम ने शुरुआती चरण में टनल के अंदर 2×3 फीट का एक छोटा सुराख बनाकर अंदर संपर्क साधने की कोशिश की थी, लेकिन अंदर से कोई हलचल या आवाज न मिलने पर अब भारी-भरकम बुलडोजरों और कटर मशीनों की मदद से रास्ते को चौड़ा किया जा रहा है।

पहचान न होने पर सामूहिक अंतिम संस्कार, अपनों की तलाश में भटक रहे परिजन

लगातार बरामद हो रहे शवों की भारी संख्या ने नेपाल सरकार के सामने एक बड़ी मानवीय और प्रशासनिक चुनौती खड़ी कर दी है। अधिकांश शवों की हालत इतनी खराब है कि उनकी पहचान कर पाना नामुमकिन हो रहा है।

ऐसे में स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय पुलिस शवों के डीएनए (DNA) सैंपल, फिंगरप्रिंट्स और पहचान से जुड़े अन्य दस्तावेजी सबूतों को सुरक्षित करने के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी कर सामूहिक रूप से उनका अंतिम संस्कार कर रही है। आपदा के पांच दिन बाद भी हजारों परिवार अपने गुमशुदा सदस्यों की तस्वीरों को हाथों में थामे अस्पतालों और राहत शिविरों के चक्कर काट रहे हैं।

सेना और पुलिस के 20 हजार से ज्यादा जवान तैनात, 394 हवाई उड़ानों से रेस्क्यू

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने राहत अभियानों का विस्तृत ब्योरा देते हुए बताया कि प्रभावित इलाकों से अब तक 9,435 नागरिकों को सुरक्षित निकालकर राहत शिविरों में पहुंचाया जा चुका है। आपातकालीन रेस्क्यू के लिए सेना और निजी कंपनियों के हेलीकॉप्टरों ने कुल 394 हवाई उड़ानें भरी हैं, जिनमें केवल रविवार को ही 72 आपातकालीन उड़ानें शामिल हैं।

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट वाले बेहद संकरे इलाकों से 279 लोगों को एयरलिफ्ट करके बचाया गया है। जमीन पर राहत व्यवस्था संभालने के लिए नेपाली सेना, पुलिस और सशस्त्र बलों के 20,618 जवान चौबीसों घंटे अभियानों में मुस्तैद हैं।

26 अस्थायी राहत शिविर बने सहारा, अस्पतालों में भर्ती हैं सैकड़ों घायल

आपदा से बेघर हुए नागरिकों के लिए रसुवा और नुवाकोट जिलों में 26 अस्थायी राहत केंद्र (Temporary Relief Camps) बनाए गए हैं। अकेले रविवार को ही इन शिविरों में 3,454 लोगों को भोजन, शुद्ध पानी, दवाएं और सिर छिपाने की जगह दी गई।

बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में घायल हुए 267 लोगों को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर काठमांडू के बड़े अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। इनमें से प्राथमिक उपचार के बाद 156 लोगों को डिस्चार्ज कर दिया गया है। प्रभावित क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियों और मानसिक आघात (Mental Trauma) से निपटने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की विशेष मेडिकल टीमें भी तैनात की गई हैं।

भारत से पहुंची 68.5 टन राहत सामग्री, बेली ब्रिज और डीएनए किट भी भेजे गए

संकट की इस घड़ी में पड़ोसी देश भारत नेपाल की मदद के लिए सबसे आगे आया है। भारतीय वायुसेना का C-130 हरक्यूलिस सैन्य परिवहन विमान 11 टन राहत सामग्री की चौथी खेप लेकर काठमांडू पहुंचा। इस विशेष खेप में सुरंगों में रेस्क्यू के लिए एडवांस उपकरण, डीएनए परीक्षण किट और अत्याधुनिक तकनीकी साधन शामिल हैं।

भारत अब तक कुल 68.5 टन आपातकालीन राहत सामग्री नेपाल भेज चुका है। इसमें जीवनरक्षक दवाएं, वाटर प्यूरीफायर गोलियां, पोर्टेबल जनरेटर, तैयार भोजन, तिरपाल, कंबल और हाइजीन किट शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, बह गए पुलों को तुरंत खड़ा करने के लिए भारत की ओर से स्टील और बेली ब्रिज (Bailey Bridge) का ढांचागत सामान भी तेजी से नेपाल भेजा जा रहा है।

संचार व्यवस्था बहाल करने की कोशिश: 181 मोबाइल टावर चालू, सैटेलाइट फोन तैनात

बाढ़ और भूस्खलन के कारण टेलीकॉम ढांचा भी बुरी तरह चरमरा गया था। राहत की बात यह है कि नेपाल टेलीकॉम के 106 और एनसेल (Ncell) के 75 टावरों को तकनीशियन टीमों ने फिर से चालू कर दिया है।

संचारविहीन और अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में तैनात रेस्क्यू टीमों के आपसी तालमेल के लिए 20 अत्याधुनिक सैटेलाइट फोन (Satellite Phones) बांटे गए हैं, ताकि बिना मोबाइल नेटवर्क के भी ऑपरेशन्स को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके।

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