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छत्तीसगढ़ की ललिता सारथी ने ₹26 हजार के कर्ज से खड़ा किया ऐसा बिजनेस, मुख्यमंत्री ने खुद किया सम्मानित!

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में 'बिहान' योजना से बदली ललिता सारथी की किस्मत। ₹26,000 के लोन से शुरू किया था सफर, आज पशुसखी बनकर हर महीने कमा रहीं ₹26,000।

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रायपुर/कोरिया। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के वनांचल (जंगल) क्षेत्र में रहने वाली एक साधारण ग्रामीण महिला ने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट आत्मविश्वास और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ (BIHAAN) की सहायता से आत्मनिर्भरता की एक ऐसी अद्भुत मिसाल पेश की है, जो आज पूरे प्रदेश की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। सोनहत जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम पहाड़पारा की निवासी ललिता सारथी को ग्रामीण इलाकों में ‘पशुसखी’ के रूप में अपनी बेहतरीन और उत्कृष्ट सेवाएं देने के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया है।

सूबे के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने ‘दीदी के गोठ’ कार्यक्रम की वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक भव्य राज्य स्तरीय समारोह में ललिता को इस गौरवमयी सम्मान से नवाजा। इस राज्य स्तरीय पुरस्कार ने न केवल ललिता के बरसों के कड़े संघर्ष को समाज में एक नई पहचान दी है, बल्कि कोरिया जिले में महिला सशक्तिकरण के अभियानों को भी एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

₹26 हजार के छोटे से ऋण से बदली पूरी जिंदगी

ललिता सारथी के इस शानदार सफर की शुरुआत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के तहत बने ‘लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने के बाद हुई। समूह का हिस्सा बनने के बाद उन्होंने स्वरोजगार शुरू करने के लिए महज 26 हजार रुपये का एक छोटा सा ऋण (लोन) लिया। इस शुरुआती राशि से उन्होंने अपने स्तर पर बकरी पालन और मुर्गी पालन का व्यवसाय शुरू किया।

काम को आगे बढ़ाते हुए उन्हें जल्द ही इस बात का अहसास हुआ कि अगर पशुपालन के व्यवसाय में वास्तव में बड़ी सफलता पानी है, तो पशुओं की बीमारियों और उनकी प्राथमिक चिकित्सा का सही ज्ञान होना बेहद जरूरी है। इसके बाद उन्होंने ‘बिहान’ योजना के माध्यम से ही ‘पशुसखी’ का विशेष तकनीकी प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) प्राप्त किया और अपने पारंपरिक रोजगार को एक बिल्कुल नई और वैज्ञानिक दिशा दी।

आधा दर्जन गांवों के किसानों और पशुपालकों का बनीं सहारा

पशुसखी की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद ललिता सारथी ने अपने ज्ञान का दायरा बढ़ाया। उन्होंने न केवल अपने मूल गांव पहाड़पारा, बल्कि उसके आसपास के लगभग छह अन्य गांवों के किसानों और पशुपालकों की मदद करना शुरू कर दिया। वे इन गांवों में जाकर किसानों के पालतू मवेशियों के लिए कृत्रिम गर्भाधान, समय पर टीकाकरण (वैक्सीनेशन), पेट के कीड़े मारने की दवा (कृमिकरण) और बधियाकरण के माध्यम से पशुओं की नस्ल सुधारने तथा बीमार मवेशियों के प्राथमिक उपचार का काम बेहद मुस्तैदी से कर रही हैं। आज के समय में वे ग्रामीण क्षेत्रों में गाय, बैल, भैंस, बकरी और मुर्गी सहित विभिन्न प्रकार के पालतू जानवरों की देखभाल और आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं आसानी से उपलब्ध करा रही हैं।

11 सदस्यों के बड़े परिवार की जिम्मेदारी से सम्मान तक का सफर

ललिता सारथी का परिवार काफी बड़ा है। पूरी तरह से पारंपरिक खेती-किसानी पर निर्भर इस 11 सदस्यीय संयुक्त परिवार के भरण-पोषण की बड़ी जिम्मेदारियों के बीच ललिता ने खुद के दम पर आत्मनिर्भर बनने का कड़ा संकल्प लिया था। बिहान समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने छोटे से कर्ज का सही इस्तेमाल करके केवल दो वर्षों के भीतर ही मुर्गी पालन और बकरी पालन को अपनी स्थायी आमदनी का एक मजबूत जरिया बना लिया। इसके बाद, गांवों में पशुसखी के रूप में लगातार काम करते हुए उन्होंने अपनी पहचान और व्यक्तिगत आय दोनों को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है।

हर महीने ₹26,000 की कमाई और समाज में बदला नजरिया

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुसखी के रूप में दी जा रही इन सेवाओं के बदले ललिता सारथी को अब हर महीने न्यूनतम 26 हजार रुपये की एक निश्चित और सम्मानजनक आय प्राप्त हो रही है। इस नियमित कमाई ने उनकी पारिवारिक और आर्थिक स्थिति को बहुत मजबूत बना दिया है। आर्थिक रूप से सशक्त होने के बाद अब वे अपने परिवार के सभी छोटे-बड़े सामाजिक और आर्थिक फैसलों में बहुत सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

ललिता सारथी का कहना है कि इस आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके जीवन में जो सबसे बड़ा और खूबसूरत बदलाव लाया है, वह है समाज और परिवार में मिलने वाला सम्मान। अब घर के मामलों में उनके विचारों और राय को पूरा महत्व दिया जाता है। वर्तमान में वे अपने किसान पति ‘हरीश’ के साथ मिलकर और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत मिलने वाले सरकारी अनुदान में अपनी खुद की कमाई के पैसों को जोड़कर अपने पूरे परिवार के लिए एक सुंदर और मजबूत पक्का मकान भी बनवा रही हैं।

कोरिया जिले की कलेक्टर श्रीमती रोक्तिमा यादव ने भी ललिता सारथी को उनकी इस ऐतिहासिक राज्य स्तरीय उपलब्धि पर हार्दिक बधाई दी है और इसे पूरे जिले के लिए एक बड़े गौरव का विषय बताया है। ललिता की यह कहानी साबित करती है कि अगर सरकारी योजनाओं का सही लाभ सही हकदार तक समय पर पहुंचे, तो ग्रामीण महिलाएं भी अपनी मेहनत से तकदीर बदल सकती हैं।

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