बस्तर (छत्तीसगढ़)। बस्तर जिले के सुदूर और आदिवासी बहुल इलाकों में ‘बैंक सखियां’ ग्रामीण आबादी के लिए एक मजबूत आर्थिक सहारा बनकर उभरी हैं। वनांचल क्षेत्रों में सक्रिय ये महिलाएं अब ग्रामीणों के लिए सबसे भरोसेमंद बैंक मित्र साबित हो रही हैं। इनकी वजह से अब ग्रामीणों को छोटे-छोटे बैंकिंग कामों के लिए मिलों दूर चलकर शहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
गांव के भीतर ही बैंक की सुविधाएं मिलने से स्थानीय लोगों के समय और पैसे दोनों की बचत हो रही है। इसके साथ ही, सरकारी योजनाओं का पैसा भी बिना किसी गड़बड़ी के सीधे और सही समय पर हितग्राहियों के हाथों में पहुंच रहा है।
माइक्रो एटीएम से घर-घर पहुंच रही हैं सुविधाएं
बस्तर जिले में इस समय 141 बैंक सखियां मोर्चा संभाले हुए हैं। ये सखियां माइक्रो एटीएम (Micro ATM) और आधार आधारित भुगतान प्रणाली (AePS) की मदद से गांवों में पैसे निकालने, जमा करने, बैंक बैलेंस चेक करने और फंड ट्रांसफर जैसी जरूरी सुविधाएं दे रही हैं। इसके अलावा, ये कम पढ़ी-लिखी महिलाओं और बुजुर्गों को डिजिटल पेमेंट करने, सुरक्षित बैंकिंग के तरीके सिखाने और वित्तीय रूप से साक्षर बनाने का काम भी कर रही हैं। इससे बस्तर के गांवों में कैशलेस और डिजिटल लेनदेन का चलन तेजी से बढ़ रहा है।

जून महीने में करोड़ों रुपये का हुआ भुगतान
आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले जून महीने में ही इन बैंक सखियों ने सरकारी योजनाओं के हजारों लाभार्थियों को उनके घर के दरवाजे पर जाकर भुगतान किया है:
- पेंशन योजना: 3,166 बुजुर्गों और जरूरतमंदों को 28 लाख 67 हजार 565 रुपये बांटे गए।
- महतारी वंदन योजना: 4,097 महिला लाभार्थियों तक 38 लाख 82 हजार 470 रुपये की राशि पहुंचाई गई।
- स्वयं सहायता समूह (SHG): 22,367 सदस्यों को 2 करोड़ 31 लाख 87 हजार रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।
- मनरेगा (MGNREGA): 2,103 मजदूरों को 15 लाख 46 हजार 179 रुपये की मजदूरी दी गई।
अन्य ट्रांजैक्शन: इसके अलावा 12,026 अन्य वित्तीय लेन-देन के जरिए 1 करोड़ 44 लाख 78 हजार रुपये से अधिक का सफल भुगतान किया गया।
बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए बनीं वरदान
इस मुहिम का सबसे बड़ा और सीधा लाभ गांव के बुजुर्गों, महिलाओं, बीमारों और दिव्यांगों को मिल रहा है, जिनके लिए पैदल चलकर बैंक जाना बेहद मुश्किल था। अब बिना किसी अतिरिक्त खर्च और परेशानी के घर के पास ही पूरे सम्मान के साथ उन्हें उनकी पेंशन और योजना की राशि मिल जाती है।
यह सराहनीय पहल स्वयं सहायता समूहों की दीदियों, छोटे दुकानदारों और ग्रामीणों में बचत की आदत को बढ़ावा दे रही है। शासन की वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) नीति को जमीन पर उतारते हुए ये बैंक सखियां अंतिम व्यक्ति और मुख्यधारा के बैंकों के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर रही हैं।
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