मुंबई। भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे बनते हैं, जो सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ धारावाहिक का ‘तुलसी विरानी’ का किरदार भी एक ऐसा ही उदाहरण है। तुलसी एक ऐसी महिला के रूप में सामने आईं, जो एक तरफ बेहद भावुक और संवेदनशील थीं, तो दूसरी तरफ बेहद मजबूत और साहसी भी थीं। वह अपनी परंपराओं और संस्कारों का सम्मान करती थीं, लेकिन गलत बातों और पुरानी सोच के खिलाफ आवाज उठाने से भी पीछे नहीं हटती थीं। अपने सिद्धांतों पर टिके रहने और सही का साथ देने की इसी खूबी ने तुलसी को हर घर की एक खास पहचान बना दिया था।
स्क्रीन का सफर और अपार सफलता
लेकिन जब देश भर में तुलसी के किरदार को अपार प्यार मिल रहा था, उसी दौरान उस किरदार को निभाने वाली महिला अपने जीवन का एक बिल्कुल नया अध्याय लिख रही थीं। यह अध्याय आगे चलकर उन्हें ग्लैमर की दुनिया से निकालकर वास्तविक जीवन के एक बड़े मंच पर ले जाने वाला था।
स्मृति ईरानी ने जब अपने अभिनय करियर की शुरुआत की, तो उन्हें ‘तुलसी’ के रूप में अभूतपूर्व सफलता और लोकप्रियता हासिल हुई। इस एक भूमिका ने उन्हें भारत के घर-घर में पहुंचा दिया। पारिवारिक रिश्तों की उलझनों को सुलझाना हो, मुश्किल परिस्थितियों से निपटना हो या परिवार के स्वाभिमान के लिए खड़े होना हो—तुलसी के इस चरित्र ने देश की महिलाओं और दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
टेलीविज़न से राजनीति की ओर कदम
लेकिन जहां ऐसी अपार सफलता मिलने के बाद कोई भी कलाकार उसी दुनिया को अपनी मंजिल मान सकता था, वहीं स्मृति ने एक बेहद अलग और कठिन रास्ता चुनने का निर्णय लिया।
स्मृति ईरानी का टेलीविज़न की दुनिया से राजनीति की ओर कदम बढ़ाना उनके करियर और जीवन का एक बड़ा मोड़ था। एक तरफ वह स्क्रीन पर एक काल्पनिक चरित्र के माध्यम से लोगों के दिलों पर राज कर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ वह असली दुनिया में राजनीतिक चर्चाओं, जनसभाओं और चुनावी राजनीति का हिस्सा बन रही थीं। इस नए रास्ते पर सफलता पाने के लिए सिर्फ पुरानी लोकप्रियता काफी नहीं थी। इसके लिए जमीनी स्तर पर मेहनत करना, जनता के साथ सीधा जुड़ाव कायम करना और सार्वजनिक जीवन की लगातार होने वाली जांच-परख का सामना करने का साहस होना जरूरी था।
चुनौतियों से भरी नई राह
समय बीतने के साथ-साथ स्मृति ने राजनीति के क्षेत्र में अपनी एक मजबूत और अलग पहचान स्थापित कर ली। उनका यह सफर आसान या बिना रुकावटों वाला नहीं था। राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, कठिन चुनौतियां सामने आईं और असफलताएं भी देखने को मिलीं। हालांकि, हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखने और बिना रुके आगे बढ़ते रहने के उनके जज्बे ने ही उन्हें एक निडर और मजबूत नेता के रूप में ढाला।
‘तुलसी’ और ‘स्मृति’ के सफर में समानता
यदि ध्यान से देखा जाए, तो ‘तुलसी’ और ‘स्मृति’ के सफर में एक बहुत ही सुंदर समानता दिखाई देती है। पर्दे पर तुलसी का किरदार काल्पनिक दुनिया में अपनों के लिए, रिश्तों की मजबूती के लिए और सही फैसलों के लिए संघर्ष कर रहा था। वहीं दूसरी ओर, स्मृति ईरानी असली दुनिया के सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में अपनी राह बना रही थीं। हालांकि दोनों के कार्यक्षेत्र और स्थितियां बिल्कुल अलग थीं, लेकिन तुलसी के चरित्र की अंतर्निहित ताकत, दृढ़ता, आत्मबल और सच्चाई के लिए खड़े होने का जज्बा स्मृति के वास्तविक जीवन के सफर में भी पूरी तरह झलकती है।
खुद को नया रूप देने की मिसाल
स्मृति ईरानी की यह कहानी इसलिए बेहद खास है क्योंकि यह सिर्फ एक सफल अभिनेत्री के राजनीति में आने की साधारण गाथा नहीं है। यह एक ऐसी महिला की कहानी है, जिसने अपनी किसी एक सफलता को ही अपनी अंतिम सीमा नहीं माना। उन्होंने खुद को कभी एक दायरे में सीमित नहीं रखा। टीवी के सेट से शुरू हुआ उनका यह सफर राजनीतिक अभियानों और सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा, जो यह दर्शाता है कि वे खुद को नए रूप में गढ़ने और अपनी पहचान का दायरा बढ़ाने में हमेशा सक्षम रही हैं।
तुलसी का किरदार निडर था, दृढ़ था और अपने जीवन के फैसलों पर हमेशा अडिग रहता था। सालों बाद भी जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यही तमाम गुण उस महिला की पहचान बने हुए हैं, जिन्होंने पर्दे पर तुलसी को अपनी अदाकारी से हमेशा के लिए अमर कर दिया।
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