भारत के पूर्वी प्रदेश ओडिशा के गंजम ज़िले में, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की RIISE परियोजना, छोटे और महिला किसानों को मौसम, फ़सल व बाज़ार से जुड़ी ताज़ा जानकारी उपलब्ध करा रही है। इससे उन्हें बदलती जलवायु के अनुरूप बेहतर तैयारी करने और अपनी आजीविका सुरक्षित रखने में मदद मिल रही है।
ओडिशा के गंजम ज़िले के हिन्जिलिकट ब्लॉक के सारू गाँव में, 35 वर्षीय अम्बिका सोइन की सुबह सूरज उगने से पहले शुरू हो जाती है। उनका बड़ा संयुक्त परिवार साल भर गुज़र-बसर के लिए एक एकड़ खेत पर निर्भर है।
इसी ज़मीन पर अम्बिका और उनका परिवार धान, काला चना, हरा चना और मौसमी सब्ज़ियाँ उगाते हैं। फ़सल से ही घर का भोजन, बच्चों की शिक्षा और आपात ज़रूरतों का ख़र्च चलता है। लेकिन अम्बिका कहती हैं कि हाल के वर्षों में खेती पहले से कहीं अधिक कठिन और अनिश्चित हो गई है।
अम्बिका याद करती हैं, “पहले हमारा धान ज़्यादातर बच जाता था. अब धान, हरा चना, काला चना – सब कुछ ख़राब हो रहा है। सब्ज़ियाँ भी अलग-अलग तरह के कीटों और बीमारियों से प्रभावित हो रही हैं।”
बारिश का बदलता मिजाज़
अम्बिका और उनके आसपास के कई किसानों के लिए बदलता मौसम बड़ी चुनौती बन गया है। बारिश अब कभी देर से आती है, तो कभी एक साथ बहुत ज़्यादा पानी बरस जाता है। कीट और बीमारियाँ भी कम समय में फ़सलों को नुक़सान पहुँचा देते हैं। हर बार फ़सल ख़राब होने पर परिवार पर दबाव बढ़ जाता है।
फ़सल बचाने के लिए अम्बिका के परिवार को भी कई बार रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सहारा लेना पड़ता है। वो कहती हैं, “हम जानते हैं कि गोबर और जैविक खाद अच्छी होती है। लेकिन यह हमें पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाती। इसलिए हमें रासायनिक उर्वरक और दवाइयाँ इस्तेमाल करनी पड़ती हैं, जबकि हम जानते हैं कि वे हमारी मिट्टी व सेहत को नुक़सान पहुँचा सकती हैं।”
लम्बे समय तक अम्बिका को लगा कि वह एक कठिन स्थिति में हैं – बदलता मौसम, कमज़ोर होती मिट्टी और एक ऐसा परिवार, जिसकी ज़रूरतें उनकी फ़सल पर निर्भर थीं।
हाथ में पहुँची जानकारी
यह स्थिति तब बदलनी शुरू हुई, जब गाँव आए फ़ील्ड कार्यकर्ताओं ने किसानों को विश्व खाद्य कार्यक्रम द्वारा समर्थित RIISE परियोजना के बारे में बताया। यह परियोजना एक सरल मोबाइल ऐप के ज़रिए किसानों को मौसम, फ़सल और बाज़ार से जुड़ी वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध कराती है।
शुरुआत में अम्बिका उत्सुक थीं, लेकिन थोड़ी झिझक भी थी। उनके लिए स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल ज़्यादातर फ़ोन कॉल करने और बच्चों की तस्वीरें खींचने तक सीमित था। फिर भी, वह गाँव में आयोजित एक प्रदर्शन सत्र में शामिल हुईं।
वहाँ उन्होंने देखा कि स्क्रीन पर कुछ बार टैप करके सप्ताह भर का मौसम पूर्वानुमान, अपनी भाषा में परामर्श सन्देश और नज़दीकी बाज़ारों में सब्ज़ियों के दाम देखे जा सकते हैं। परियोजना टीम की मदद से उन्होंने अपने फ़ोन में RIISE ऐप इंस्टॉल कर लिया।
जब अम्बिका को पहली बार ऐप पर मौसम से जुड़ी चेतावनी मिली, तो उन्होंने उसे तीन बार पढ़ा। सन्देश में बताया गया था कि कुछ परिस्थितियों में धान में कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है, और किसानों को समय रहते अपने खेतों की जाँच करने की सलाह दी गई थी। उस शाम वह अपने खेतों की सँकरी मेड़ों पर चलीं और झुककर व ध्यान से पत्तियों का मुआयना किया।
वो कहती हैं, “पहले हमें नुक़सान दिखने के बाद ही पता चलता था कि कुछ गड़बड़ है। अब जानकारी पहले मिल जाती है, इसलिए हमें समझ में आ जाता है कि खेत में किस बात पर ध्यान देना है।”
एक शान्त, लेकिन अहम बदलाव
यह ऐप धीरे-धीरे अम्बिका की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया। वह परिवार के लिए खाना बनाने और खेतों में काम करने के बीच, RIISE के सन्देश देखती हैं, ताकि पता चल सके कि बारिश होने वाली है या गर्म हवाओं की आशंका है।
जब उन्हें पत्तियों पर दिख रही किसी बीमारी को लेकर सन्देह होता है, या कोई सलाह पूरी तरह समझ नहीं आती, तो वह ऐप में दिए गए नम्बर के ज़रिए कृषि विशेषज्ञ को फ़ोन करती हैं।
वो बताती हैं “हम अपने सवाल सीधे फ़ोन पर पूछ सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमें मार्ग दर्शन मिल रहा है।”
यह कोई बड़ा, दिखाई देने वाला बदलाव नहीं है, यह एक शान्त बदलाव है, जिसे चिन्तारहित रातों और ज़्यादा भरोसेमन्द फ़ैसलों में महसूस किया जा सकता है।
अब अम्बिका मौसम पूर्वानुमान देखकर अधिक सोच-समझकर बुआई करती हैं। वह यह भी तय कर पाती हैं कि कब कीटनाशकों का छिड़काव करना है और कब इन्तज़ार करना है, ताकि जहाँ सम्भव हो, अनावश्यक रसायनों का इस्तेमाल कम किया जा सके।
ऐप से उन्होंने सब्ज़ियाँ बेचने से पहले बाज़ार भाव देखना भी सीखा है। इससे वह बाज़ार जाने का सही समय बेहतर ढंग से तय कर पाती हैं और जोखिम कम होता है।
आत्मविश्वास में वृद्धि
अम्बिका के लिए सबसे बड़ा बदलाव शायद उनके आत्मविश्वास में आया है। पहले खेती से जुड़े फ़ैसले ज़्यादातर परिवार के अन्य लोग लेते थे। अब, हाथ में जानकारी होने के कारण, वह भी खुलकर अपनी राय रखती हैं – कौन-सी फ़सल लगानी है और कटाई कब करनी है।
वह कहती हैं, “हम सीख रहे हैं कि फ़सलें ख़राब होने से पहले उन्हें कैसे बचाया जाए। इससे मुझे साहस मिलता है।”
अम्बिका, तटीय ओडिशा के जलवायु-जोखिमों से प्रभावित गाँव में आज भी केवल एक एकड़ ज़मीन पर खेती करती हैं। लेकिन बदलते मौसम का सामना करते हुए अब वह ख़ुद को अकेला महसूस नहीं करतीं।
WFP की RIISE परियोजना और उसके किसान-अनुकूल ऐप ने जानकारी को सीधे उनके हाथों तक पहुँचा दिया है। अब उनका स्मार्टफ़ोन परिवार की खाद्य और आजीविका सुरक्षा में एक अहम साथी बन गया है।
जलवायु सहनसक्षमता को मज़बूती
ओडिशा में RIISE परियोजना (Resilient and Inclusive Initiatives for Sustainability and Empowerment), विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और ओडिशा सरकार के कृषि एवं किसान सशक्तिकरण विभाग के सहयोग से लागू की गई है।
इसे Citi समूह का समर्थन प्राप्त है.इस परियोजना के तहत छोटे किसानों, महिला किसानों और उनके समूहों को जलवायु-कुशल कृषि तरीक़ों, मौसम व फ़सल की जानकारी और सामुदायिक सहयोग से जोड़ा जा रहा है।
उद्देश्य है कि किसान बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के लिए बेहतर तैयारी कर सकें, नुक़सान कम कर सकें और अपनी आजीविका को अधिक सुरक्षित बना सकें। यह परियोजना वर्तमान में गंजम ज़िले के चार ब्लॉकों की 10 ग्राम पंचायतों में 7 हज़ार 700 किसानों को मदद दे रही है।
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