रायपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड की महिलाएं कृषि, पशुपालन और छोटे उद्योगों से जुड़कर स्वावलंबन की नई मिसाल पेश कर रही हैं। अब इन महिलाओं ने रक्षाबंधन पर्व को अपनी आजीविका का जरिया बनाते हुए स्थानीय अनाजों और बीजों से आकर्षक व पर्यावरण-अनुकूल ‘बीज राखियां’ (Seed Rakhis) तैयार करना शुरू किया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़ी ये महिलाएं अपनी मेहनत से अतिरिक्त आय अर्जित करने के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण का भी अनूठा संदेश दे रही हैं।
मिट्टी में दबते ही पौधा बन जाएगी यह राखी
‘बिहान’ योजना से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाएं स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध अनाजों और बीजों के इस्तेमाल से ये मनमोहक राखियां बना रही हैं।
राखी बनाने में इस्तेमाल होने वाले बीज:
- अनाज व दालें: धान, चावल, उड़द, मसूर और मूंगफली।
- सब्जियों के बीज: मक्का, कुम्हड़ा, लौकी, करेला, सेमी, ग्वारफली, भिंडी और बरबट्टी।
इन बीजों को धागे, रंग, स्टीकर और फेवीकोल की मदद से बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है। इन राखियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि त्यौहार बीतने के बाद यदि इन्हें मिट्टी में दबा दिया जाए, तो इनमें मौजूद बीज अंकुरित होकर पौधों में बदल जाएंगे। इस तरह यह पहल भाई-बहन के अटूट रिश्ते को मजबूत करने के साथ-साथ हरियाली बढ़ाने का भी काम करेगी।
ऑनलाइन ट्रेनिंग से मिला हुनर, बिक्री की तैयारी पूरी
धरमजयगढ़ के ग्राम पंचायत कोयलार स्थित ‘जय ठाकुरदेव स्व-सहायता समूह’ की सदस्य व कृषि सखी श्रीमती गणपति राठिया ने बताया कि समूह की महिलाएं अब पारंपरिक कृषि और पशुपालन के साथ-साथ त्यौहारी उत्पादों का निर्माण कर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।
महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बीज राखी बनाने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। इसके बाद जिले के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू हुआ।
गुणवत्ता परीक्षण के बाद बाजार में पहुंचेगा पहला बैच
गत 20 जुलाई को पुसौर, रायगढ़, धरमजयगढ़, खरसिया, तमनार और घरघोड़ा की स्व-सहायता समूहों द्वारा बनाई गई राखियों का चयन समिति द्वारा मूल्यांकन और परीक्षण किया गया।
धरमजयगढ़ में तैयार की गई राखियों की पहली खेप जिले में भेजी जा चुकी है और जल्द ही इनकी बिक्री शुरू की जाएगी। स्थानीय संसाधनों से बनी यह विशेष बीज राखियां इस रक्षाबंधन पर महिला सशक्तिकरण, स्वावलंबन और पर्यावरण सुरक्षा की नई पहचान बनेंगी।
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