रायपुर। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में बंदूक छोड़कर मुख्यधारा में लौटे युवाओं की जिंदगी अब बदल रही है। जिला प्रशासन और एसबीआई आरसेटी के सहयोग से चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रम के तहत आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस पहल से 280 से अधिक युवाओं को रोजगार का मौका मिला है। जिन हाथों में कभी हथियार थे, वे अब गरीबों के घर बनाने का काम सीख रहे हैं। यह पुनर्वास कार्यक्रम मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में चल रहा है और बस्तर क्षेत्र में शांति व विकास की नई मिसाल बन रहा है।
बस्तर में बदलाव की कहानी
बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक नक्सल हिंसा और संघर्ष के लिए जाना जाता था। सुकमा जैसे जिले के घने जंगलों में कई युवा हिंसा के रास्ते पर चले गए। स्कूल-कॉलेज की जगह बंदूक की आवाज और भय का माहौल रहा। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। आत्मसमर्पण करने वाले युवा समाज की मुख्यधारा में वापस आ रहे हैं। राज्य सरकार के पुनर्वास कार्यक्रम उन्हें न सिर्फ सुरक्षा दे रहा है बल्कि हुनर सिखाकर सम्मानजनक जीवन भी दे रहा है।
25 युवाओं को राजमिस्त्री प्रशिक्षण
जिला प्रशासन सुकमा और एसबीआई आरसेटी के संयुक्त प्रयास से 25 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें 13 महिलाएं और 12 पुरुष शामिल हैं। ये युवा ईंट जोड़ना, दीवार खड़ी करना, प्लास्टर करना, माप-जोख और आधुनिक निर्माण तकनीक सीख रहे हैं। यह प्रशिक्षण प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) जैसे कार्यक्रमों के लिए उन्हें तैयार कर रहा है।
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद ये युवा स्थानीय निर्माण कार्यों में काम कर सकेंगे। इससे न सिर्फ उनकी अपनी आय बढ़ेगी बल्कि जिले में कुशल मजदूरों की कमी भी पूरी होगी।
सोड़ी हूंगी: आत्मविश्वास से भरी नई शुरुआत
कोंटा क्षेत्र के अरलमपल्ली गांव की सोड़ी हूंगी इस कार्यक्रम की एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं। जंगलों की अनिश्चित जिंदगी छोड़कर उन्होंने आत्मसमर्पण किया। प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा और प्रशिक्षण का मौका दिया। आज वे राजमिस्त्री का काम सीख रही हैं।
हूंगी कहती हैं कि पहले जीवन में हर दिन डर और अनिश्चितता रहती थी। अब उनके पास हुनर है। वे परिवार का सहारा बनना चाहती हैं और अपनी मेहनत से कमाना चाहती हैं। ऐसी कई महिलाओं के लिए यह कार्यक्रम आत्मसम्मान का साधन बन गया है।
पदम रैनू: सरकार ने दिया नया रास्ता
जगरगुंडा के मंडीमरका गांव के पदम रैनू भी इस कार्यक्रम से जुड़े हैं। उन्होंने जंगलों में बिताए दिनों को याद करते हुए बताया कि वहां जीवन संघर्ष और अनिश्चितता से भरा था। न स्थायी घर था, न भविष्य की कोई गारंटी।
आत्मसमर्पण के बाद उन्हें रहने की सुविधा, सीखने का मौका और सम्मान मिला है। पदम कहते हैं कि सरकार ने उन्हें भटकने से बचाया और जीने का नया आधार दिया। उनकी यह बात कई अन्य युवाओं की भावना को दर्शाती है।
280 से ज्यादा युवाओं को मिला लाभ
कलेक्टर अमित कुमार के अनुसार, आत्मसमर्पण केवल हथियार छोड़ना नहीं है। यह व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाने की प्रक्रिया है। अब तक लगभग 280 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री प्रशिक्षण दिया जा चुका है। प्रशासन इन युवाओं के सामाजिक और आर्थिक पुनर्स्थापन पर भी काम कर रहा है।
इस कार्यक्रम का लक्ष्य है कि ये युवा स्थायी रोजगार पाएं और समाज में सम्मान के साथ रहें।
स्थानीय विकास को नई गति
सुकमा जैसे दूरस्थ इलाकों में पहले कुशल राजमिस्त्रियों की कमी रहती थी। इससे सरकारी आवास योजनाओं का काम प्रभावित होता था। अब प्रशिक्षित युवा न सिर्फ खुद रोजगार कमा रहे हैं बल्कि जिले के विकास कार्यों में भी मदद कर रहे हैं।
एक ही पहल से दो फायदे हो रहे हैं – युवाओं को नया जीवन और क्षेत्र को कुशल workforce।
पुनर्वास कार्यक्रम की खासियत
यह पहल सिर्फ प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। इसमें सुरक्षा, रहने की व्यवस्था और सामाजिक सम्मान शामिल है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार बस्तर में शांति स्थापना और विकास पर जोर दे रही है।
आत्मसमर्पित युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए कौशल विकास को महत्व दिया जा रहा है। राजमिस्त्री का हुनर इसलिए चुना गया क्योंकि निर्माण क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर काम की अच्छी संभावना है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है
इस कार्यक्रम में महिलाओं की अच्छी संख्या है। सोड़ी हूंगी जैसी महिलाएं न सिर्फ हुनर सीख रही हैं बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए उदाहरण भी बन रही हैं। इससे क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिल रहा है।
भविष्य की ओर बढ़ते कदम
प्रशिक्षण ले रहे युवा अब निर्माण स्थलों पर काम करने के लिए तैयार हो रहे हैं। वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब परिवारों के घर बनाने में अपनी भूमिका निभाएंगे। इससे उनकी आय के साथ-साथ समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।
जिन हाथों में कभी हथियार थे, वे अब ईंट और गारे से घर बना रहे हैं। यह बदलाव बस्तर के भविष्य की ओर इशारा करता है।
नई उम्मीद का बस्तर
सुकमा की यह कहानी सिर्फ कुछ युवाओं की नहीं है। यह पूरे क्षेत्र में हो रहे बदलाव की तस्वीर है। जहां पहले भय और हिंसा की चर्चा होती थी, वहां अब विकास, रोजगार और हुनर की बात हो रही है।
प्रशासन की यह संवेदनशील पहल दिखाती है कि हर व्यक्ति को दूसरा मौका मिलना चाहिए। सही अवसर और सहयोग से भटके हुए युवा भी समाज के उपयोगी सदस्य बन सकते हैं।
स्थायी शांति की नींव
यह कार्यक्रम विकास और विश्वास दोनों को मजबूत कर रहा है। आत्मनिर्भर युवा शांति बनाए रखने में भी मदद करेंगे। सुकमा में हो रहा यह काम पूरे देश के लिए उदाहरण है कि पुनर्वास कैसे प्रभावी तरीके से किया जा सकता है।
बस्तर अब नई पहचान बना रहा है – जहां उम्मीद जीत रही है और हाथ निर्माण का काम कर रहे हैं।
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