नई दिल्ली/डॉ. रूप्सी कक्कड़। आज के समय में मोबाइल फोन हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। यह काम आसान बनाता है, हमें दुनिया से जोड़ता है और कई सुविधाएँ देता है। लेकिन एक सवाल हर माता-पिता को खुद से पूछना चाहिए—क्या हमारा मोबाइल हमारे बच्चे को हमसे दूर कर रहा है?
जब हम बच्चे के सामने बार-बार मोबाइल देखने लगते हैं, तो हम अनजाने में उसके साथ बिताने वाला सबसे महत्वपूर्ण समय खो देते हैं। मनोविज्ञान में इस समस्या को “टेक्नोफेरेंस (Technoference)” कहा जाता है, अर्थात् तकनीक के कारण रिश्तों और बातचीत में आने वाली रुकावट।
‘स्टिल फेस एक्सपेरिमेंट’ हमें क्या सिखाता है?
एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रयोग में देखा गया कि जब एक माँ अपने बच्चे के साथ खेलते-खेलते अचानक बिना किसी भाव के शांत चेहरा बना लेती है, तो बच्चा कुछ ही क्षणों में बेचैन हो जाता है। वह माँ का ध्यान पाने की कोशिश करता है, लेकिन प्रतिक्रिया न मिलने पर रोने लगता है और तनाव महसूस करता है।
आज यही स्थिति तब बनती है जब माता-पिता बच्चे के साथ बैठे होते हैं, लेकिन उनका ध्यान पूरी तरह मोबाइल स्क्रीन पर होता है। बच्चे के लिए यह अनुभव ऐसा होता है जैसे उसके सामने मौजूद व्यक्ति भावनात्मक रूप से उससे जुड़ा ही नहीं है। धीरे-धीरे बच्चे को महसूस होने लगता है कि उसकी बात और उसकी मौजूदगी मोबाइल जितनी महत्वपूर्ण नहीं है।
बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
- माता-पिता से भावनात्मक दूरी: बच्चे सुरक्षित और आत्मविश्वासी तभी महसूस करते हैं जब उन्हें माता-पिता का पूरा ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव मिलता है। बार-बार मोबाइल में व्यस्त रहने से यह जुड़ाव कमजोर हो सकता है।
- व्यवहार में बदलाव: ऐसे बच्चे अधिक चिड़चिड़े, गुस्सैल या ज़िद्दी हो सकते हैं। कुछ बच्चे ध्यान आकर्षित करने के लिए गलत व्यवहार करने लगते हैं, जबकि कुछ चुपचाप अपने भीतर उदासी और अकेलापन महसूस करने लगते हैं।
- भाषा और सामाजिक कौशल पर असर: बच्चे सबसे ज़्यादा सीखते हैं अपने माता-पिता को देखकर। यदि बातचीत की जगह मोबाइल स्क्रीन ले लेती है, तो बच्चों के बोलने, सुनने और दूसरों से जुड़ने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- भावनाओं को समझने में कठिनाई: बच्चे अपने माता-पिता के चेहरे के भाव, आवाज़ और स्पर्श से भावनाएँ समझना सीखते हैं। जब माता-पिता बार-बार स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चे को यह सीखने के अवसर कम मिलते हैं।
बच्चे ऐसा व्यवहार क्यों करने लगते हैं?
हर बच्चा अपने माता-पिता का ध्यान और अपनापन चाहता है। जब उसे बार-बार महसूस होता है कि मोबाइल उसकी जगह ले रहा है, तो वह अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देता है। कोई बच्चा शरारत करने लगता है, कोई गुस्सा दिखाता है, कोई चुप हो जाता है और कुछ बच्चे खुद भी मोबाइल या गेम्स में ज़्यादा समय बिताने लगते हैं।
असल में उनका व्यवहार अक्सर यह कह रहा होता है— “मुझे आपकी स्क्रीन नहीं, आपका समय चाहिए।”
माता-पिता क्या कर सकते हैं?
- मोबाइल-मुक्त समय तय करें : खाने के समय, परिवार के साथ बैठते समय और सोने से कम-से-कम एक घंटा पहले मोबाइल का उपयोग न करें।
- बच्चे से बात करते समय मोबाइल अलग रखें : जब बच्चा आपसे कुछ कहे, तो उसकी ओर देखें, उसकी बात ध्यान से सुनें और उसे महसूस कराएँ कि उस समय आपकी प्राथमिकता वही है।
- परिवार के लिए डिजिटल नियम बनाएँ : घर में सभी सदस्य, बड़े और छोटे, स्क्रीन के उपयोग के लिए समान नियम अपनाएँ। बच्चे वही सीखते हैं जो वे आपको करते हुए देखते हैं।
- रोज़ कुछ समय केवल बच्चे के लिए रखें : दिन में केवल 20–30 मिनट भी बिना मोबाइल के खेलना, कहानी सुनाना, साथ टहलना या बातचीत करना बच्चे के मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
- खुद उदाहरण बनें : यदि माता-पिता हर समय फोन पर रहेंगे, तो बच्चों से सीमित स्क्रीन टाइम की उम्मीद करना कठिन होगा।
मोबाइल एक उपयोगी साधन है, लेकिन यह आपके और आपके बच्चे के बीच भावनात्मक दूरी का कारण नहीं बनना चाहिए। बच्चों को महंगे खिलौनों, तेज़ इंटरनेट या नए मोबाइल की उतनी ज़रूरत नहीं होती, जितनी अपने माता-पिता के समय, ध्यान और प्यार की होती है।
अगली बार जब आपका बच्चा आपको कुछ दिखाना चाहे और उसी समय मोबाइल पर नोटिफिकेशन आए, तो एक पल रुककर खुद से पूछिए— “इस समय ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है—यह स्क्रीन या मेरे बच्चे की मुस्कान?” कई बार केवल कुछ मिनटों के लिए मोबाइल नीचे रखना ही बच्चे के आत्मविश्वास, भावनात्मक सुरक्षा और भविष्य में सबसे बड़ा निवेश साबित हो सकता है.
लेखिका: डॉ. रूप्सी कक्कड़ (MBBS, MD Psychiatry – AIIMS), Consultant Psychiatrist
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