नई दिल्ली। मानवता की सेवा और निस्वार्थ प्रेम की एक अद्भुत मिसाल पेश करते हुए संत निरंकारी मिशन ने 24 अप्रैल को ‘मानव एकता दिवस’ के रूप में मनाया। युगप्रवर्तक बाबा गुरबचन सिंह जी की पावन स्मृति में आयोजित इस दिवस पर दिल्ली समेत पूरे देश में विशाल रक्तदान शिविरों (Blood Donation Camps) का आयोजन किया गया।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता जी की उपस्थिति में दिल्ली के ग्राउंड नंबर 8 में मुख्य कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर देश भर के 212 स्थानों पर लगभग 40,000 यूनिट रक्त संकलित किया गया। माता सुदीक्षा जी ने संदेश दिया कि जब इंसानियत को सबसे ऊपर रखा जाता है, तभी समाज में वास्तविक बदलाव आता है। यह आयोजन केवल एक इवेंट नहीं, बल्कि करुणा और सह-अस्तित्व का एक जीवंत उत्सव बन गया।
बाबा गुरबचन सिंह जी की स्मृति में ‘मानव एकता दिवस’
24 अप्रैल का दिन निरंकारी मिशन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दिन बाबा गुरबचन सिंह जी के त्याग और उनके शांति के संदेश को समर्पित है। इस वर्ष भी दिल्ली के निरंकारी समागम ग्राउंड में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटे। इस मौके पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने स्पष्ट किया कि बाबा हरदेव सिंह जी ने हमेशा बाबा गुरबचन सिंह जी के जीवन को अपनी प्रेरणा का आधार बनाया।
उन्होंने सिखाया कि मानव जीवन का असली मकसद केवल अपने लिए जीना नहीं, बल्कि दूसरों के काम आना है। जब हम ‘मानव को मानव हो प्यारा, एक-दूजे का बने सहारा’ के विचार को अपने जीवन में उतारते हैं, तभी समाज का सही कल्याण संभव है।
दिल्ली और देशभर में रक्तदान की लहर
संत निरंकारी मण्डल के सचिव जोगिन्दर सुखीजा के अनुसार, दिल्ली में निरंकारी सरोवर के सामने स्थित ग्राउंड नंबर 2 में आयोजित मुख्य कैंप में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। यहाँ विनम्रता और सेवा भाव के साथ लगभग 850 यूनिट रक्तदान किया गया। पूरे भारतवर्ष की बात करें तो 212 अलग-अलग केंद्रों पर शिविर लगाए गए।
मानवता के प्रति अपनी इसी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए निरंकारी राजपिता जी ने स्वयं रक्तदान कर युवाओं के सामने एक प्रेरक उदाहरण पेश किया। यह संदेश साफ था कि युवाओं की ऊर्जा समाज निर्माण और सेवा में लगनी चाहिए।
सेवा का संकल्प: 705 शिविरों का लक्ष्य
मानव एकता दिवस केवल एक दिन की गतिविधि नहीं है, बल्कि यह साल भर चलने वाली सेवा-यात्रा की शुरुआत है। मिशन की योजना के अनुसार, आने वाले समय में देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 705 रक्तदान शिविर आयोजित किए जाएंगे। इन शिविरों का उद्देश्य समाज में करुणा और एकत्व (Unity) की भावना को और अधिक मजबूत करना है। निरंकारी मिशन का मानना है कि रक्त का दान किसी की जान बचा सकता है, और यही ईश्वर की सच्ची बंदगी है।
चार दशकों का गौरवशाली इतिहास
निरंकारी मिशन में रक्तदान की यह पावन परंपरा पिछले 40 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता:
- अब तक कुल 9,174 रक्तदान शिविर लगाए जा चुके हैं।
- इन कैंपों के जरिए लगभग 15,00,230 यूनिट रक्त इकट्ठा किया जा चुका है।
यह आंकड़े साबित करते हैं कि मिशन केवल बातों में नहीं, बल्कि धरातल पर मानव सेवा के लिए समर्पित है। बाबा हरदेव सिंह जी का प्रसिद्ध नारा “रक्त नाड़ियों में बहे, नालियों में नहीं” आज भी लाखों अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
प्रतिष्ठित अस्पतालों का मिला सहयोग
दिल्ली में आयोजित इन शिविरों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का खास ख्याल रखा गया। इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी (IRCS) के साथ-साथ दिल्ली के कई बड़े अस्पतालों के अनुभवी डॉक्टरों और उनकी टीम ने अपनी सेवाएं दीं। इनमें प्रमुख नाम शामिल हैं:
- एम्स (AIIMS) और एम्स सी.एन.सी
- राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल
- सफदरजंग और लोक नायक जयप्रकाश नारायण (LNJP) अस्पताल
- गुरु तेग बहादुर, जी.बी. पंत और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज
- दीन दयाल उपाध्याय और हिंदूराव अस्पताल
सभी रक्तदाताओं की उचित स्वास्थ्य जाँच (Health Check-up) के बाद ही सुरक्षित तरीके से रक्तदान की प्रक्रिया संपन्न कराई गई।
रेड क्रॉस सोसाइटी ने किया सम्मानित
मानवता की इस निस्वार्थ सेवा को देखते हुए इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता जी को विशेष सम्मान और पुरस्कार प्रदान किया। यह सम्मान उस अटूट समर्पण के लिए है जो मिशन पिछले कई दशकों से बिना किसी भेदभाव के समाज के प्रति निभा रहा है।
युवाओं के लिए प्रेरणा और नशामुक्त जीवन
युगप्रवर्तक बाबा गुरबचन सिंह जी ने हमेशा युवाओं को सत्य, सादगी और सद्भावना का मार्ग दिखाया। उन्होंने युवाओं से अपनी ऊर्जा को नशाखोरी जैसी बुराइयों में बर्बाद करने के बजाय समाजसेवा और परोपकार में लगाने का आह्वान किया था। माता सुदीक्षा जी महाराज आज उसी विजन को आगे बढ़ा रही हैं, जहाँ प्रेम और सेवा को ही धर्म का असली स्वरूप माना जाता है। उन्होंने जोर दिया कि सेवा केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह दिल से दिल तक जुड़ा एक निस्वार्थ रिश्ता है।
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